कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में जहाँ कांग्रेस को महज दो सीटों पर संतोष करना पड़ा, वहीं फरक्का विधानसभा सीट की जीत ने लोकतंत्र की एक ऐसी मिसाल पेश की है जो दशकों तक याद रखी जाएगी। कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख की यह जीत महज राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि एक नागरिक के अपने संवैधानिक अधिकारों को वापस पाने की लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई का सुखद परिणाम है। जब सूबे के दिग्गज नेता चुनावी मैदान में पसीना बहा रहे थे, तब मोताब शेख अदालतों के गलियारों में इस बात की जंग लड़ रहे थे कि उन्हें एक भारतीय नागरिक के तौर पर वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार है भी या नहीं। दरअसल, चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान रहस्यमयी तरीके से उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया गया था, जिससे उनके भविष्य पर सवालिया निशान लग गया था।
स्थानीय स्तर पर प्रशासन से गुहार लगाने के बाद जब कोई रास्ता नहीं सूझा, तो मोताब शेख ने देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया। समय की कमी और चुनावी तारीखों के दबाव के बीच यह मामला बेहद संवेदनशील हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला नवनिर्मित अपीलीय न्यायाधिकरण को सौंपा गया, जिसकी कमान कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम के हाथों में थी। दिलचस्प बात यह है कि जिस ट्रिब्यूनल ने उनका भविष्य तय किया, उसका गठन ही नामांकन शुरू होने से महज एक दिन पहले यानी 5 अप्रैल को हुआ था। ट्रिब्यूनल की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के पास नाम हटाए जाने का कोई ठोस तकनीकी आधार नहीं था, जबकि मोताब शेख के पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों में कोई विसंगति नहीं पाई गई। अदालत ने मोताब शेख के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें वैध मतदाता घोषित किया और 27 लाख आवेदकों की भीड़ में वह पहले ऐसे व्यक्ति बने जिनका आवेदन इस विशेष प्रक्रिया के तहत मंजूर हुआ।
कानूनी बाधाएं पार करने के बाद मोताब शेख जब चुनावी समर में उतरे, तो उनके पास केवल पार्टी का झंडा नहीं, बल्कि संघर्ष की एक जीती-जागती दास्तां थी। फरक्का की जनता ने उनके इस धैर्य और जुझारूपन का सम्मान करते हुए उन्हें सर-आंखों पर बिठाया। कड़ी टक्कर के बीच उन्होंने बीजेपी के सुधीर चौधरी को 8 हजार से अधिक मतों के अंतर से पटखनी देकर विधानसभा का टिकट पक्का कर लिया। आज मोताब शेख की चर्चा बंगाल की राजनीति में एक ऐसे ‘विधायक’ के रूप में हो रही है, जिसने पहले वोट देने का हक जीता और फिर उसी हक के जरिए जनता का दिल जीतकर सत्ता के गलियारे में अपनी जगह बनाई। यह जीत साबित करती है कि लोकतंत्र में कानून का दरवाजा खटखटाने का साहस रखने वाला एक आम आदमी भी व्यवस्था की त्रुटियों को सुधारकर नायक बन सकता है।
