नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने निजी स्वतंत्रता, आपसी सहमति और आधुनिक समाज के बदलते रिश्तों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और प्रगतिशील फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी भी तरह से उनके चरित्र को आंकने का पैमाना नहीं हो सकते। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी विशेष जोर दिया है कि यदि कोई प्रेम संबंध किसी कारणवश शादी के मुकाम तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे अपने आप में कोई अपराध या धोखाधड़ी नहीं माना जाना चाहिए।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने इस संवेदनशील विषय पर सुनवाई करते हुए कहा कि दो बालिगों के बीच सहमति से बने रिश्तों के आधार पर समाज या किसी व्यक्ति के चरित्र को लेकर नकारात्मक राय नहीं बनाई जा सकती। अदालत के अनुसार, देश में ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है जो दो वयस्क नागरिकों को अपनी मर्जी से रिश्ता रखने या रहने की आजादी से रोकता हो।
यह पूरा मामला तेलंगाना के एक पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी, गाजुला तिरुपति की भर्ती से जुड़ा हुआ था, जिसका चयन सिर्फ इसलिए रद्द कर दिया गया था क्योंकि एक दशक पहले पड़ोस की एक महिला के साथ उनके संबंधों को लेकर एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। हालांकि, बाद में वह मामला आपसी समझौते से पूरी तरह सुलझ गया था। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उस उम्मीदवार को राहत देते हुए उसकी नियुक्ति का रास्ता साफ किया, बल्कि इस बहाने समाज, कानून और व्यक्तिगत आजादी के चौराहे पर खड़े एक बड़े विमर्श को भी स्पष्ट किया। पीठ ने साफ कहा कि हर रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता और केवल इस आधार पर कि रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हुआ, यह मान लेना पूरी तरह गलत होगा कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ छल किया है।
बदलती सामाजिक हकीकतों को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब सरकारी विभागों और संस्थाओं को अपनी पुरानी रूढ़िवादी सोच के ढर्रे से बाहर निकलना होगा। अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय करते हुए कहा कि अगर दो बालिग कुछ साल तक किसी रिश्ते में रहते हैं, तो कानूनी तौर पर यही माना जाएगा कि वह रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित था। ऐसे मामलों में शादी के झूठे वादे का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार खारिज कर चुका है।
नियोक्ता यानी सरकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर कोई मामला समझौते से खत्म हुआ है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उम्मीदवार दोषी है। न्यायाधीशों ने कहा कि नियोक्ता केवल तब किसी उम्मीदवार को अयोग्य मान सकता था, जब इस बात के पुख्ता सबूत होते कि शिकायतकर्ता महिला को समझौते के लिए डराया या धमकाया गया था, जबकि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था। अदालत ने अंत में बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला को रिश्ते में धोखा मिला या नहीं, यह सिर्फ वही बता सकती थी; जनता या कोई सरकारी विभाग खुद से इसका अंदाजा नहीं लगा सकता। जब शिकायतकर्ता ने खुद केस आगे नहीं बढ़ाया और मामला खत्म कर दिया, तो विभाग को कयासों के आधार पर उम्मीदवार के चरित्र पर उंगली उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
