नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रमुख सदस्यों सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके ने केंद्र सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। अपनी दादी के निधन के कारण महाराष्ट्र स्थित पैतृक गांव में मौजूद दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना कब से अपराध हो गया। सरकार की कार्रवाई को अघोषित तानाशाही करार देते हुए उन्होंने चुनौती दी कि यदि केंद्र में साहस है, तो वह आधिकारिक तौर पर देश में आपातकाल घोषित करे।
बाद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र की सत्ता पर गंभीर आरोप मढ़े। उन्होंने कहा कि उनका विरोध किसी दल विशेष से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया में हो रही धांधली के खिलाफ है, जिसके सहारे नरेंद्र मोदी सत्ता में बने हुए हैं। विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया ब्लॉक के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि सीजेपी हमेशा एक स्वतंत्र दबाव समूह (प्रेशर ग्रुप) के रूप में काम करती रहेगी, लेकिन इसका अर्थ विपक्षी एकता का विरोध नहीं है। दोनों का अंतिम उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा करना है, इसलिए साझा मुद्दों पर यह लड़ाई एक ही दिशा में लड़ी जा रही है।
इस राजनीतिक टकराव की पृष्ठभूमि 10 अक्टूबर से जुड़ी है, जब दिल्ली में सीजेपी के एक विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आशुतोष रांका, सौरव दास और अभिजीत दिपके को हिरासत में लिया था। एक वर्ष तक शांति बनाए रखने के बॉन्ड पर रिहा होने के बाद, 13 अक्टूबर को ये नेता फिर से जंतर-मंतर पहुंचे और नारेबाजी करने लगे। चूंकि दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने 11 अक्टूबर को सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया था और इसके विकल्प के रूप में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को तय किया था, इसलिए प्रतिबंधित क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश और नियमों के उल्लंघन के चलते पुलिस ने यह सख्त कानूनी कार्रवाई की।
सीजेपी और अन्य संगठन इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित विसंगतियों को लेकर आंदोलनरत हैं। जंतर-मंतर पर पाबंदी के फैसले की निंदा करते हुए सीजेपी ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों को राजधानी के मुख्य राजनीतिक केंद्र से दूर धकेलना दरअसल आम जनता की असहमति की आवाज को दबाने की सोची-समझी रणनीति है। संगठन का कहना है कि वे कानूनी बंदिशों और गिरफ्तारियों के बावजूद चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग पर पीछे नहीं हटेंगे।
