रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली केलो नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। नदी में लगातार बढ़ते प्लास्टिक कचरे और प्रदूषण पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार और पर्यावरण संरक्षण मंडल के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ किया है कि केवल छोटे दुकानदारों और ठेला व्यवसायियों पर जुर्माना लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सिंगल यूज प्लास्टिक के असली विनिर्माताओं (मैन्युफैक्चरर्स) और बड़े सप्लायर्स पर कानूनी शिकंजा कसना होगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई में सीधे मुख्य सचिव से की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
अदालत के इस कड़े रुख के बाद नगर निगम भले ही शहर की दर्जनभर दुकानों पर जुर्माना लगाकर अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। नगर निगम ने हर साल की तरह इस बार भी नदी की जलकुंभी और कचरा साफ करने के लिए भारी चैन-माउंटेड मशीनें तो उतार दी हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे महज एक ‘रीटेक ड्रामा’ मान रहे हैं। पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि जब तक प्रदूषण के मूल स्रोत पर प्रहार नहीं होगा, तब तक केलो को स्वच्छ रखना मुमकिन नहीं है। अदालत ने भी प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सड़क, बाजार, नालियों, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थलों को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए महज औपचारिकता न की जाए, बल्कि एक ठोस और विशेष अभियान चलाकर इसके रूट नेटवर्क को ध्वस्त किया जाए।
केलो नदी के इस हाल के पीछे केवल प्लास्टिक ही नहीं, बल्कि शहर का अनियोजित ड्रेनेज सिस्टम भी जिम्मेदार है। शहर के बड़े नालों के जरिए रोजाना टनों घरेलू कचरा, गंदा पानी और सिल्ट सीधे नदी के सीने में समा रहे हैं। स्थानीय निवासियों की मानें तो कई नालों में कचरा रोकने के लिए लगाई गई लोहे की जालियां (स्क्रीन) महीनों से साफ नहीं की गई हैं, जिसके कारण भारी बारिश होते ही यह पूरा कचरा उफनकर नदी में मिल जाता है। नदी किनारे बसी बस्तियों से निकलने वाला ठोस अपशिष्ट भी इस समस्या को और भयावह बना रहा है। देश के सबसे प्रदूषित नदीखंडों (रिवर स्ट्रेच) में शुमार केलो को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर दो-दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) तो स्थापित किए गए, लेकिन वे भी नदी में मिलने वाले दूषित प्रवाह को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं।
अब गेंद पूरी तरह से शासन और जिला प्रशासन के पाले में है। हाईकोर्ट की इस सख्त निगरानी के बाद अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस बड़े प्लास्टिक माफिया और सप्लाई चेन पर चोट करने की है, जो शहर में धड़ल्ले से प्रतिबंधित प्लास्टिक डंप कर रहे हैं। यदि इस बार भी कार्रवाई केवल सतही सफाई और छोटे फुटपाथ व्यापारियों तक ही सीमित रही, तो करोड़ों रुपये बहाने के बाद भी केलो नदी को प्रदूषण के दलदल से कभी नहीं निकाला जा सकेगा। आने वाले दिनों में मुख्य सचिव की रिपोर्ट और प्रशासन का अगला कदम ही यह तय करेगा कि रायगढ़ की यह जीवनरेखा वाकई पुनर्जीवित होगी या फाइलों में ही साफ होती रहेगी।
