ज़िन्दगी को आकार देता बचपन..पारंपरिक कला के गुर सीखते बच्चे…

पारंपरिक कलाओं को जीवित रखने बच्चे दिखा रहे उत्सुकता

अम्बिकापुर

संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ एवं भारतीय विपणन विकास केंद्र की ओर से लगातार छठवें वर्ष नगर के गल्र्स स्कूल में आयोजित शिविर में भारी संख्या में बच्चे पारंपरिक कलाओं को सीखकर आकार देने में लगे हुये हैं। 10 दिवसीय इस शिविर में स्थानीय शिल्पकारों व कला प्रशिक्षकों द्वारा बच्चों व महिलाओं को रजवार भित्ती चित्र, चित्रकारी, पैरा आर्ट, नृत्य कला, ड्राय फ्लावर, गोदना आर्ट, क्ले आर्ट व कैलीग्राफी जैसी विशेष कला में पारंगत किया जा रहा है। इस वर्ष बच्चों के अलावा महिलाओं ने भी इन पारंपरिक कलाओं को सीखने जबरजस्त उत्साह दिखाया है। पारंपरिक कलाओं को जीवित रखने के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में युवाओं को कला से जोडने का प्रयास काफी हद तक सार्थक हो चुका है। पिछले 5 वर्षों में हुये आकार के आयोजन से निकलकर कई प्रशिक्षार्थी अब दूसरों को इन कलाओं में पारंगत कर रहे हैं।

इस शिविर के माध्यम से सरगुजा सहित अन्य क्षेत्रों में विलुप्त होती कलाकृतियों को सभी वर्गों तक पहुंचाने के लक्ष्य को लेकर आयोजित शिविर में पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष प्रशिक्षार्थियों की संख्या में इजाफा हुआ है। कार्यक्रम प्रभारी जीआर जगत के अनुसार पिछले वर्ष जहां प्रशिक्षार्थियों की संख्या 250 के लगभग थी, वहीं इस वर्ष वह संख्या बढ़कर 400 के लगभग हो चुकी है। इस बार के शिविर में पहली बार कैलीग्राफी की विधा लोगों को सिखाई जा रही है। इस कार्यक्रम के संचालन में वंदना दत्ता, भिलाई-दुुर्ग से आई कैलीग्राफी की प्रशिक्षक ऐश्वर्या जैन द्वारा बच्चों सहित बड़ों को रोमन लिपि पर आधारित इस कला में पारंगत किया जा रहा है, वहीं रजवार भित्ती चित्र में सरगुजा के पंडि़त राम, चित्रकारी में प्रकाश एक्का, अमित सारथी, पैरा आर्ट में सिवेंद्र देवांगन, नृत्य कला में मंजू एक्का, चंकी यादव, ड्राय फ्लावर में दीपमाला पन्ना, प्राची अग्रवाल, गोदना आर्ट में रामकेती बाई व क्ले आर्ट में नीतू गुप्ता प्रशिक्षण दे रही हैं। प्रशिक्षार्थियों को बेहतर सेवा व सुविधा प्रदान करने के लिये सीबीएमडी से योगेश विश्वकर्मा, संजय पाठक, महेंद्र सिंह राजपुत, अविनाश वर्मा, भुनेश्वर बांदे सक्रिय हैं।