जगदलपुर। आस्था, संस्कृति और सदियों पुरानी अनूठी परंपराओं को समेटे बस्तर का ऐतिहासिक ‘गोंचा महापर्व 2026’ सोमवार से श्रद्धा और उल्लास के वातावरण में शुरू हो गया। जगदलपुर के ऐतिहासिक श्रीजगन्नाथ मंदिर में देवस्नान यानी ‘चंदन जात्रा’ पूजा विधान के साथ इस रियासतकालीन उत्सव का शंखनाद हुआ। इस वर्ष बस्तर की इस पावन धरा पर एक नया इतिहास भी रचा गया। हर साल मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर होने वाले महाअभिषेक का इस बार विस्तार किया गया था। मंदिर प्रांगण में एक भव्य मंच स्थापित कर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्रीजगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र स्वामी के विग्रहों का पंचामृत, दिव्य चंदन और बस्तर की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी के पवित्र जल से महाअभिषेक संपन्न हुआ। इस अलौकिक दृश्य के गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े।
इस पारंपरिक अनुष्ठान की शुरुआत आसना ग्राम से भगवान शालिग्राम को ससम्मान मंदिर लाने के साथ हुई। इसके बाद 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पुरोहित इंद्रावती नदी से कांवड़ में पवित्र जल लेकर मंदिर पहुंचे। महाअभिषेक के पश्चात भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भ्राता बलभद्र के सभी 22 विग्रहों को राजसी वैभव के साथ मुक्ति मंडप में विराजित किया गया। इसी के साथ प्रभु का ‘अनसर काल’ (अस्वस्थता की अवधि या एकांतवास) भी प्रारंभ हो गया है, जो आगामी 14 जुलाई तक चलेगा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस 15 दिवसीय अनसर काल में भगवान अस्वस्थ रहते हैं, जिसके कारण आम भक्तों के लिए उनके दर्शन पूरी तरह वर्जित रहेंगे। इस दौरान 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के विशेष सेवादार और पंडित ही प्रभु की सेवा-सुश्रूषा करेंगे। भगवान को स्वस्थ करने के लिए विशेष औषधियुक्त काढ़ा और भोग अर्पित किया जाएगा। हालांकि भक्त इस अवधि में मंदिर पहुंचकर इस औषधियुक्त पावन प्रसाद को प्राप्त कर पुण्य लाभ कमा सकेंगे।
619 वर्षों से अनवरत चली आ रही इस अटूट परंपरा को लेकर बस्तर गोंचा समिति और ब्राह्मण समाज ने इस वर्ष की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। इस महापर्व के अंतर्गत आगामी दिनों में बस्तर की संस्कृति के कई अनूठे रंग देखने को मिलेंगे। तय कार्यक्रम के अनुसार, 15 जुलाई को बहुप्रतीक्षित ‘नेत्रोत्सव’ पूजा विधान संपन्न होगा, जिसके बाद भक्तों को श्रीहरि के दर्शन सुलभ हो सकेंगे। इसके अगले ही दिन, 16 जुलाई को बस्तर की प्रसिद्ध ‘श्रीगोंचा रथयात्रा’ का भव्य आयोजन होगा, जिसमें भगवान जगन्नाथ स्वामी अपनी मौसी के घर यानी जनकपुरी (सिरहासार भवन) के लिए प्रस्थान करेंगे और वहां नौ दिनों तक श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे।
उत्सव के क्रम को आगे बढ़ाते हुए 19 जुलाई को सुबह 10 बजे से भव्य अखंड रामायण पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद 20 जुलाई को हेरा पंचमी का पारंपरिक विधान, 21 जुलाई को महाप्रभु को छप्पन भोग का अर्पण और 23 जुलाई को सामूहिक उपनयन संस्कार जैसे मांगलिक कार्य संपन्न होंगे। बस्तर गोंचा पर्व का मुख्य आकर्षण 24 जुलाई को ‘बाहुड़ा गोंचा रथयात्रा’ (उल्टा रथ) और कपाट फेड़ा पूजा विधान के रूप में सामने आएगा। अंततः 25 जुलाई को एकादशी के पावन अवसर पर इस वर्ष के भव्य बस्तर गोंचा महापर्व का आगामी वर्ष के संकल्प के साथ समापन (परायण) होगा।
सोमवार को आयोजित इस शुभारंभ समारोह में 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष वेद प्रकाश पांडे, पूर्व अध्यक्ष व संरक्षक ईश्वर खंबारी, महापर्व समिति के अध्यक्ष मुक्तेश्वर पाण्डे सहित समाज के प्रमुख पदेन पदाधिकारी राधाकांत पाणिग्राही, उमाशंकर पाढ़ी, सुदर्शन पाणिग्राही, आत्माराम जोशी, नरेंद्र पाणिग्राही और राकेश पांडे विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनके साथ ही बसंत पांडा, गजेंद्र पाणिग्राही, महेश्वरी पांडे, रविंद्र पांडे, चिंतामणि पांडे, विजय पांडे, दिलेश्वर पांडे, मिथिलेश पाणिग्राही, बनमाली पाणिग्राही, विम्भाधर पांडे, प्रशांत पाणिग्राही, महेंद्रनाथ जोशी, आशु आचार्य, मोहन जोशी और मिनेश पाणिग्राही सहित समाज की महिला विंग, युवा समिति के सदस्यों और हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने महाप्रभु के जयकारों के साथ बस्तर को भक्तिमय कर दिया।
