नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। मंगलवार को विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष के नेता और डीएमके विधायक उदयनिधि स्टालिन ने अपने संबोधन में ‘सनातन विरोधी’ रुख को दोहराते हुए इसे पूरी तरह समाप्त करने की मांग की। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की उपस्थिति में सदन को संबोधित करते हुए स्टालिन ने कड़े शब्दों में कहा कि जिसने लोगों को बांटने का काम किया है, उस ‘सनातन’ का अंत होना अनिवार्य है। गौरतलब है कि साल 2023 में भी उनके इसी तरह के बयान पर देशव्यापी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था, लेकिन सदन के भीतर मुख्यमंत्री के सामने इस मांग को दोहराकर उन्होंने अपने इरादे साफ कर दिए हैं।
सनातन के मुद्दे के अलावा, उदयनिधि ने भाषाई अस्मिता और राजकीय सम्मान का मामला भी पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने वंदे मातरम् के बाद तमिलनाडु का राज्य गीत बजाए जाने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि राज्य के गौरव को कभी भी दूसरे स्थान पर नहीं धकेला जाना चाहिए। पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि वहां मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण में वंदे मातरम् नहीं बजाया गया था, जबकि तमिलनाडु में इसे प्राथमिकता दी गई। उन्होंने सरकार को सचेत किया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं आनी चाहिए जहाँ राज्य गीत की वरीयता कम होती दिखे।
सदन में अपने भाषण के दौरान उदयनिधि ने राजनीतिक कड़वाहट को दरकिनार कर शिष्टाचार की भी बात की। उन्होंने मुख्यमंत्री और अपने बीच के पुराने संबंधों का हवाला देते हुए बताया कि वे दोनों एक ही कॉलेज के छात्र रहे हैं। इस साझा इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि सत्ता पक्ष और विपक्ष को भले ही अलग-अलग कतारों में बैठना पड़ता हो, लेकिन राज्य के विकास के लिए मिलकर काम करना जरूरी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की कि वे विपक्ष के अनुभवों और सुझावों को सकारात्मक रूप से स्वीकार करें ताकि सदन की गरिमा और तमिलनाडु की प्रगति दोनों सुनिश्चित हो सकें।
