अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर में चर्चित DHT केयर हॉस्पिटल से जुड़े गंभीर वित्तीय गबन, जातिगत दुर्व्यवहार और जान से मारने की धमकी के सनसनीखेज मामले में आखिरकार पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है। लेकिन इस कार्रवाई ने पुलिस की कार्यशैली और निष्पक्षता पर ऐसे तीखे सवाल छोड़ दिए हैं, जिनका जवाब देना अब सरगुजा पुलिस के लिए आसान नहीं होगा। जब एक प्रतिष्ठित आदिवासी डॉक्टर दंपति न्याय की गुहार लगाते हुए सिटी कोतवाली, आजाक थाना और एसपी दफ्तर के चक्कर काटते रहे, तब तंत्र मौन साधे बैठा रहा। 14 अगस्त को आईजी को दिए गए आवेदन के करीब 20 दिन बाद और 3 सितंबर को गांधी चौक पर ‘सरगुजा बचाओ संघर्ष समिति’ के सड़क पर उतरकर किए गए जोरदार प्रदर्शन के ठीक अगले दिन 4 सितंबर को दर्ज हुई यह एफआईआर सीधे तौर पर इशारा कर रही है कि खाकी रसूखदारों के आगे झुक रही थी या फिर केवल जनआक्रोश के दबाव में ही एक्शन मोड में आई।
दर्ज प्राथमिक सूचना के अनुसार, DHT केयर हॉस्पिटल की संचालिका डॉ. दीपिका टोप्पो ने आरोप लगाया है कि करीब दो वर्ष पूर्व आए सुशील कुमार राय ने खुद को फार्मासिस्ट बताकर अस्पताल के वित्तीय प्रबंधन का काम संभाला। आरोप है कि उसने बिना किसी जानकारी और सहमति के अस्पताल के खाते से लगभग 65 लाख रुपये का गबन कर लिया। जब 3 जुलाई को प्रबंधन द्वारा दस्तावेजों व बैंक खातों का हिसाब मांगा गया, तो कथित रूप से अनावेदक ने अपने सहयोगी नवीन द्विवेदी के साथ मिलकर न केवल गाली-गलौज की, बल्कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर पूरे स्टाफ और मरीजों के सामने अपमानित किया। शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि नवीन द्विवेदी ने मामले को दबाने और अस्पताल चलाने देने की एवज में 50 लाख रुपये की एकमुश्त रंगदारी तथा 5 लाख रुपये महीने की वसूली की मांग की, साथ ही बैंकॉक दौरे के वीडियो को कथित तौर पर वायरल कर बदनाम करने और जान से मारने की धमकी दी।
इस पूरे शिकायती आवेदन पर आजाक थाना पुलिस ने सुशील कुमार राय और नवीन द्विवेदी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296, 351(3), 3(5) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (संशोधन 2015) की धारा 3(1)(r)(s) के तहत मामला पंजीबद्ध कर लिया है।
हालांकि, यह पूरा घटनाक्रम फिलहाल पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों और दर्ज प्राथमिक सूचना पर आधारित है, जिनकी सत्यता की कानूनी और तकनीकी पुष्टि होना अभी शेष है। दोनों पक्षों की ओर से अस्पताल संचालन के लेन-देन, वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट, गवाहों के बयानों और साक्ष्यों की फोरेंसिक व ऑडियो जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। भारतीय न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी भी व्यक्ति को अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
किंतु, जांच का परिणाम चाहे जो निकले, इस पूरे प्रकरण ने पुलिस की प्राथमिक संवेदनशीलता और कार्यप्रणाली को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल उठता है कि जब एक पढ़े-लिखे डॉक्टर दंपति को एफआईआर दर्ज कराने के लिए जिले के आला अफसरों की चौखट नापनी पड़े और सड़क पर जनआंदोलन भड़कने का इंतजार करना पड़े, तो एक आम फरियादी की सुनवाई कैसे होती होगी? 20 दिनों तक जांच के नाम पर मामले को लटकाए रखना क्या आरोपियों के कथित रसूख के प्रभाव का नतीजा था? अब जब एफआईआर दर्ज हो चुकी है, तो पुलिस के सामने निष्पक्ष, समयबद्ध और पारदर्शी जांच की सबसे बड़ी चुनौती है। देखना यह होगा कि क्या जांच टीम रसूख और दबाव से मुक्त होकर सच्चाई सामने ला पाती है, या फिर यह मामला भी पुलिस की जांच फाइलों में तारीख-दर-तारीख उलझकर रह जाएगा।
