– राहुल गांधी की टीम के कथित गोपनीय सर्वे की चर्चा से जांजगीर-चांपा कांग्रेस में हलचल, किसकी कुर्सी बचेगी और किसका टिकट कटेगा?
जांजगीर-चांपा। जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से पार्टी के भीतर टिकट की धड़कनें तेज होने लगी हैं। सूत्रों की माने तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस की ओर से प्रदेश की सभी 90 विधानसभा सीटों को लेकर कराए गए कथित गोपनीय सर्वे में जांजगीर-चांपा जिले के दो विधायकों की परफॉर्मेंस को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
जिले में जांजगीर-चांपा से विधायक व्यास कश्यप, अकलतरा से युवा एवं हाल ही में विधानसभा द्वारा सम्मानित उत्कृष्ट विधायक के रूप में विधायक राघवेन्द्र सिंह और पामगढ़ से महिला विधायक शेषराज हरबंस वर्तमान में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनमें से दो विधायकों के क्षेत्र में जनता की नाराजगी, संगठनात्मक शिकायतों और अपेक्षाकृत कमजोर जनसंपर्क को लेकर सर्वे में नकारात्मक फीडबैक मिलने की राजनीतिक चर्चा है।
जिले के दो विधायकों से जानता तो नाराज है ही कार्यकर्ता भी उस विधायक से दूरी बना लिए हैं, दूसरी ओर युवा कांग्रेस की संगठन चुनाव ने और भी आग में घी डालने का काम कर रही है. इससे युवा कार्यकर्ता के बीच विधायकों से संबंध खराब हो रहे हैं तो वही गुट बाजी भी अब खुलकर सामने आ गई हैं.
ऐसे में क्या यह युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता आने वाले चुनाव में अपने विधायक के लिए काम करेंगे जिले में कई उदाहरण हैं जिसमें विधायक समर्थक प्रत्याशी के अलावा और भी युवा कांग्रेस के प्रत्याशी मैदान पर दिख रहे हैं. जो आने वाले समय में इन्हीं विधायकों के खिलाफ काम करेंगे. इसके बाद विधायक की खुर्सी कमजोर होगी और परिणाम विधायक के खिलाफ आएगा. जो आज विधायक के खिलाफ काम कर रहा है वह कैसे विधायक के साथ आने वाला समय में साथ काम करेगा. आपसी सामंजस्य नहीं होने की वजह से यह स्थिति जिले में दिख रहा है.
हालांकि कांग्रेस की ओर से आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई सर्वे सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसलिए टिकट कटने की बात को फिलहाल अंतिम फैसला मानना जल्दबाजी होगी। मगर राजनीति में सर्वे की एक खबर भी कई बार विधायक की नींद उड़ाने के लिए काफी होती है।
कहा जा रहा है कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में मौजूदा विधायकों की लोकप्रियता, जनता से संपर्क, संगठन पर पकड़ और क्षेत्र में उनकी सक्रियता को भी पार्टी के संभावित टिकट निर्णय का आधार बनाया जा सकता है।
कहने को तो तीन विधायक हैं, लेकिन टिकट की कुर्सियां अभी से दो के लिए आरामदायक नहीं दिख रहीं। किसी का रिपोर्ट कार्ड चमक रहा है तो किसी के पन्नों पर लाल निशान होने की चर्चा है। अब विधायक जनता के बीच कितने नंबर लाते हैं और पार्टी के ‘सर्वे वाले मास्टर’ कितने नंबर देते हैं, यही असली खेल होगा।
फिलहाल कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही है,अगले चुनाव में तीनों पुराने चेहरे मैदान में होंगे या दो चेहरों को बदलकर पार्टी ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ का इलाज खोजेगी?
आगामी महीनों में तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है। तब तक सर्वे की चर्चा ने जिले की कांग्रेस की राजनीति में ‘टिकट खिसकी, टेंशन किसकी’ वाला माहौल जरूर बना दिया है।
