खंडवा। आज के दौर में जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बोल्ड और फूहड़ कंटेंट की भरमार है, वहीं आस्था, सादगी और पारिवारिक मूल्यों के दम पर छोटे बजट की फिल्म ‘हनुमान अंश’ दर्शकों के दिलों पर अपनी गहरी छाप छोड़ रही है। फिल्म को मिल रहे अपार जनसमर्थन का जश्न मनाने मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर खंडवा पहुंचीं अभिनेत्री नेहा परांजपे ने मीडिया से रूबरू होते हुए इस सफर के कई अनछुए पहलू साझा किए। फिल्म में माता पार्वती का जीवंत किरदार निभाने वाली नेहा ने उत्साह जताते हुए कहा कि यह कहानी बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग को जोड़ रही है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि इस सात्विक प्रयास की गूंज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक जरूर पहुंचेगी; यदि प्रधानमंत्री इस फिल्म को देखते हैं और अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, तो यह पूरी टीम के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।
बातचीत के दौरान नेहा परांजपे ने अपने और अपने बेटे विहान के चयन का एक रोचक किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि एक विज्ञापन की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात फिल्म निर्माता विशाल से हुई थी। उस अनौपचारिक बातचीत में नेहा ने सहज रूप से बुंदेली भाषा में संवाद किया। उन्हें तनिक भी अंदाजा नहीं था कि सफर के दौरान बुंदेली बोली का यह छोटा सा टेस्ट उनके और उनके बेटे के लिए इस खास प्रोजेक्ट के दरवाजे खोल देगा और उन्हें यह महत्वपूर्ण भूमिका मिल जाएगी।फिल्म की मूल भावना पर प्रकाश डालते हुए अभिनेत्री ने बताया कि ‘हनुमान अंश’ की परिकल्पना पूज्य संत नीम करोली बाबा के विचारों और उनके सानिध्य से जीवन में आए सकारात्मक बदलावों से प्रेरित है। कहानी एक ऐसे साधारण मनुष्य के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दैवीय शक्तियों से संपन्न होने के बावजूद अहंकार से कोसों दूर रहता है।
फिल्म की मूल भावना पर प्रकाश डालते हुए अभिनेत्री ने बताया कि ‘हनुमान अंश’ की परिकल्पना पूज्य संत नीम करोली बाबा के विचारों और उनके सानिध्य से जीवन में आए सकारात्मक बदलावों से प्रेरित है। कहानी एक ऐसे साधारण मनुष्य के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दैवीय शक्तियों से संपन्न होने के बावजूद अहंकार से कोसों दूर रहता है।फिल्म के जरिए अंधविश्वास को बढ़ावा देने से जुड़े सवालों पर नेहा ने स्पष्ट और बेबाक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह फिल्म किसी भी तरह का अंधविश्वास नहीं फैलाती, बल्कि सर्वोच्च शक्ति के प्रति आस्था को रेखांकित करती है। यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति किसी एक खास देवी-देवता को ही पूजे, लेकिन हर संवेदनशील इंसान के भीतर किसी न किसी परम शक्ति पर भरोसा होता है। संकट की घड़ी में जब कोई व्यक्ति दिल से कहता है कि ‘सब ठीक हो जाए’, तो वह अनजाने में उसी अदृश्य सर्वोच्च शक्ति पर विश्वास जता रहा होता है।
फिल्म के जरिए अंधविश्वास को बढ़ावा देने से जुड़े सवालों पर नेहा ने स्पष्ट और बेबाक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह फिल्म किसी भी तरह का अंधविश्वास नहीं फैलाती, बल्कि सर्वोच्च शक्ति के प्रति आस्था को रेखांकित करती है। यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति किसी एक खास देवी-देवता को ही पूजे, लेकिन हर संवेदनशील इंसान के भीतर किसी न किसी परम शक्ति पर भरोसा होता है। संकट की घड़ी में जब कोई व्यक्ति दिल से कहता है कि ‘सब ठीक हो जाए’, तो वह अनजाने में उसी अदृश्य सर्वोच्च शक्ति पर विश्वास जता रहा होता है।
