कांकेर। लाल आतंक के खौफ और दुर्गम पहाड़ों की ओट में छिपा अबूझमाड़ का बिनागुंडा गाँव आज बदलाव की एक ऐसी नई इबारत लिख रहा है, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव थी। जिसे कभी माओवादियों का सबसे सुरक्षित और अभेद्य गढ़ माना जाता था, वहाँ की उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर जब कांकेर लोकसभा सांसद भोजराज नाग की मोटरसाइकिल के पहिए थमे, तो वह सिर्फ एक जनप्रतिनिधि का दौरा नहीं, बल्कि विकास की एक नई सुबह का शंखनाद था। वर्षों की घोर उपेक्षा, घने जंगलों और सुरक्षा के खतरों को चीरते हुए पहली बार कोई बड़ा जनप्रतिनिधि सीधे ग्रामीणों के बीच उनके ही अंदाज़ में पहुंचा था, जिससे पूरा इलाका एक ऐतिहासिक पल का गवाह बन गया।

प्रशासनिक अमले के साथ पहुंचे सांसद का ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक संस्कृति और आत्मीयता के साथ स्वागत किया, लेकिन इस आतिथ्य के पीछे बरसों की टीस और बुनियादी सुविधाओं की तड़प भी साफ़ दिखाई दी। ग्रामीणों ने सांसद के सामने खुलकर अपनी मांगें रखीं और बताया कि कैसे आज भी कई बस्तियों तक पहुंचने के लिए उन्हें घंटों पैदल सफर करना पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम इस इलाके में छोटी बीमारियां भी कैसे जानलेवा बन जाती हैं, इसका दर्द ग्रामीणों की आंखों में साफ़ तैर रहा था। इसके साथ ही बच्चों और महिलाओं में पसरे कुपोषण ने यह साफ़ कर दिया कि इस सुदूर अंचल तक विकास की किरण पहुंचाना प्रशासन के लिए कितनी बड़ी चुनौती है।

इस भावुक और ऐतिहासिक दौरे के दौरान माओवादी हिंसा का दंश झेलने वाले परिवारों का दर्द भी उभरकर सामने आया। सांसद भोजराज नाग ने हिंसा में अपनी जान गंवाने वाले मनेश नूरुटी को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके शोकाकुल परिजनों को ढांढस बंधाया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि हिंसा कभी भी किसी समस्या का अंत नहीं हो सकती, बल्कि शांति और संवाद ही तरक्की का असली रास्ता हैं। इसी दौरान गाँव की एक आदिवासी महिला पुनाय नूरुटी ने अत्यंत भावुक होकर न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने अपने पति को निर्दोष बताते हुए नक्सली मामलों में जेल भेजे जाने की शिकायत की और निष्पक्ष जांच की मांग की। गाँव की अन्य महिलाओं ने भी सुर में सुर मिलाते हुए प्रशासन से अपील की कि जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों के मामलों की कानूनी समीक्षा की जाए ताकि किसी बेगुनाह को सजा न भुगतनी पड़े।

ग्रामीणों के दर्द और उनकी जायज मांगों को सुनने के बाद सांसद ने उन्हें पूरी संवेदनशीलता के साथ आश्वस्त किया कि अबूझमाड़ का विकास अब उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने मौके पर ही मौजूद अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए कि वे पूरे क्षेत्र का एक विस्तृत और व्यावहारिक सर्वे कर जल्द से जल्द कार्ययोजना तैयार करें, ताकि शासन की कल्याणकारी योजनाएं कागजों से निकलकर सीधे जमीन पर दिखें। उन्होंने संकल्प दोहराया कि अब अबूझमाड़ की पहचान बंदूक या नक्सलवाद से नहीं, बल्कि बेहतर स्कूलों, अस्पतालों, पक्की सड़कों और रोजगार के अवसरों से होगी।

बिनागुंडा की यह मोटरसाइकिल यात्रा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अब अबूझमाड़ की हवाएं बदल रही हैं। जिस धरती पर कभी सिर्फ बारूद की गंध और बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी, वहाँ आज का आदिवासी अपने अधिकारों, बच्चों की शिक्षा, रोजगार और न्याय के लिए आवाज़ बुलंद कर रहा है। हालांकि, भौगोलिक बाधाएं और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन अब भी एक बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं, लेकिन इस दौरे ने ग्रामीणों के भीतर एक नया विश्वास ज़रूर जगाया है।
