अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के स्वर्ग और ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहे जाने वाले खूबसूरत पर्यटन स्थल मैनपाट में इन दिनों विकास और विनाश के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है। छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (CMDC) और निजी कंपनियों द्वारा मैनपाट के चार प्रमुख गांवों रोपाखार, सरभंजा, लुरैना और पथरई में प्रस्तावित नई बॉक्साइट खदानों को लेकर पूरा इलाका सुलग उठा है। सरभंजा में आयोजित जनसुनवाई के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों और कंपनियों के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए ग्रामीणों ने इसका पूर्ण बहिष्कार कर दिया और ‘CMDC भागो’ के गगनभेदी नारे लगाए। आसमान से बरसती भारी बारिश भी ग्रामीणों के इस जनाक्रोश की आग को ठंडा नहीं कर पाई और सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग छाते ताने इस परियोजना के खिलाफ डटे रहे।
यह पूरा विवाद उस समय और गहरा गया जब राजनीति के दोनों धुर विरोधी दल इस मुद्दे पर जनता के साथ खड़े नजर आए। सीतापुर के वर्तमान भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो ने जनसुनवाई में पहुंचकर साफ कर दिया कि किसी भी विकास कार्य के लिए स्थानीय जनता की सहमति सर्वोपरि है और जनभावनाओं को कुचलकर इस खदान को किसी भी कीमत पर शुरू नहीं होने दिया जाएगा, हालांकि उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इस परियोजना की लीज साल 2022 में तत्कालीन भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय दी गई थी। वहीं, दूसरी ओर पूर्व मंत्री और क्षेत्र के कद्दावर नेता अमरजीत भगत भी इस नई खदान के विरोध में लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, जिससे यह आंदोलन अब एक बड़े सियासी और जनआंदोलन में तब्दील हो चुका है।
इस पूरे बवाल की जमीनी हकीकत बयां करते हुए ग्राम पंचायत रोखापार के उप सरपंच रजनीश पाण्डेय ने सीधे तौर पर प्रशासन और कंपनियों के गठजोड़ पर फर्जीवाड़े का संगीन आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कमलेश्वरपुर और रोपाखार जैसे क्षेत्रों में होने वाली यह माइनिंग पूरी तरह से बेतरतीब और अवैध तरीके से प्लान की गई है। कंपनियों ने अपने माइनिंग प्लान में मैनपाट की पहचान माने जाने वाले वैश्विक पर्यटन स्थलों जैसे तिब्बती संस्कृति का केंद्र ‘बौद्ध विहार’, ‘बौद्ध मंदिर’, अपनी हिलती हुई जमीन के लिए दुनियाभर में मशहूर ‘जलजली’ और जैव विविधता से समृद्ध ‘बायो डायवर्सिटी पार्क’ के अस्तित्व को पूरी तरह छिपा दिया है। हद तो यह है कि जो रिजर्व फॉरेस्ट (आरक्षित वन) इन प्रस्तावित खदानों के ठीक पास स्थित है, उसे सरकारी कागजों में 10 किलोमीटर दूर दिखा दिया गया है।
करीब 55 हेक्टेयर की इस विशालकाय भूमि पर होने वाले खनन के संबंध में न तो स्थानीय ग्राम पंचायत को कोई दस्तावेज दिए गए और न ही ग्राम सभा से कोई वैधानिक प्रस्ताव पास कराया गया। यह पूरी तरह से घनी बसाहट वाला क्षेत्र है, जहां सालों से तिब्बती शरणार्थी पुनर्वास के तहत शांतिपूर्वक निवास कर रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का साफ कहना है कि कंपनियों द्वारा महज 40-50 लोगों को फर्जी रोजगार देने का झांसा देकर पूरे मैनपाट की प्राकृतिक संपदा को दांव पर लगाया जा रहा है। अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच करोड़ों के खेल का आरोप लगाते हुए उन्होंने दो टूक चेतावनी दी है कि भले ही पिछली सरकार ने छल-कपट से इसकी लीज दे दी हो, लेकिन जमीन पर एक इंच भी खुदाई नहीं होने दी जाएगी।
दरअसल, मैनपाट सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यदि यहां बॉक्साइट की नई खदानें खुलती हैं, तो यह सुंदर वादी पूरी तरह मरुस्थल में बदल जाएगी। माइनिंग के चलते यहां का अनूठा जलस्तर प्रभावित होगा, जिससे ‘उल्टा पानी’ (जहां पानी ढलान के विपरीत बहता है) जैसे प्राकृतिक चमत्कार हमेशा के लिए नष्ट हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाले उत्खनन से न केवल पहाड़ों का सीना छलनी होगा, बल्कि यहां के घने जंगलों के कटने से हाथी और अन्य वन्यजीवों का इंसानी बस्तियों में दखल (मानव-हाथी द्वंद्व) जानलेवा स्तर तक बढ़ जाएगा।
मैनपाट की ठंडी आबोहवा और धुंध, जो इसे ‘शिमला’ का दर्जा दिलाती है, वह धूल के गुबार और हैवी धुएं में तब्दील हो जाएगी, जिससे स्थानीय इको-सिस्टम पूरी तरह तबाह हो जाएगा। ग्रामीणों की यह चिंता बेहद जायज है कि जिन 12 गांवों में पहले से खदानें चल रही हैं, वहां पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, ऐसे में नए क्षेत्रों को भी विनाश की भट्टी में झोंक देना मैनपाट के अस्तित्व को ही समाप्त कर देगा। पर्यटन ठप होने से हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा, यही वजह है कि आज मैनपाट का बच्चा-बच्चा अपनी जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुका है।
