अम्बिकापुर..(सीतापुर/अनिल उपाध्याय)..सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र की जीवनदायिनी कही जाने वाली मांड नदी आज अपने अस्तित्व की आखिरी सांसें गिन रही है। सालों से चल रहे अंधाधुंध और अवैध रेत खनन ने इस सदानीरा नदी को एक बदसूरत मरुस्थल में तब्दील कर दिया है। क्षेत्र में सक्रिय रसूखदार बालू माफियाओं ने चंद रुपयों की खनक के लिए नदी और सहायक नालों का इस कदर बेरहमी से दोहन किया है कि इनका मूल भौगोलिक स्वरूप ही नष्ट हो चुका है। रेत की इस खुली तस्करी ने मांड नदी के जलस्तर को पाताल में धकेल दिया है, जिससे नदी पूरी तरह सूख चुकी है।
आज आलम यह है कि गर्मियों के मौसम में ग्रामीणों को अपने निस्तार और मवेशियों को प्यास बुझाने के लिए बूंद-बूंद पानी को दर-दर भटकना पड़ रहा है। नदी के सीने पर भारी मशीनें उतारकर चौबीसों घंटे किए गए अवैध उत्खनन के कारण जगह-जगह गहरे और जानलेवा तालाबनुमा गड्ढे बन गए हैं, जो आगामी मानसून के दौरान किसी भी बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण दे रहे हैं। स्थानीय जनता में इस तबाही को लेकर भारी आक्रोश है, लेकिन सबसे हैरान और विचलित करने वाली बात यह है कि इस पूरे विनाश पर जिम्मेदार विभागों और स्थानीय प्रशासन ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

एक दौर था जब मांड नदी इस क्षेत्र के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। इसके दोनों तटों पर फसलें लहलहाती थीं। नदी के किनारे बसे तेलाइधार, रायकेरा, टोकोपारा, मँगरेलगढ़, धरमपुर, नावाटोली, केशला, भिठुवा और प्रतापगढ़ सहित दर्जनों गांवों के किसान मांड नदी के पानी के भरोसे गेहूं, सब्जियों और अन्य फसलों की बंपर पैदावार करते थे। भीषण गर्मी में भी नदी का जलस्तर इतना समृद्ध रहता था कि बेजुबान जानवरों की प्यास बुझने के साथ ही खेतों की भरपूर सिंचाई हो जाती थी। मगर बीते कुछ वर्षों में इस जीवनदायिनी को रेत माफिया की ऐसी नजर लगी कि आज नदी खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर, बिना किसी वैध अनुमति के, राजनीतिक रसूख के दम पर माफिया ने नदी का सीना चीर डाला। इस खेल में जितना कसूर रेत चोरों का है, उससे कहीं अधिक गुनाहगार स्थानीय प्रशासन है, जो मूकदर्शक बनकर इस तबाही का तमाशा देखता रहा। राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक साठगांठ का ही नतीजा है कि नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए आज भी उत्खनन और परिवहन धड़ल्ले से जारी है। ग्राम तेलाइधार से लेकर राधापुर तक नदी में पांच-पांच फीट गहरे ऐसे गड्ढे हो चुके हैं, जहां चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं हो रहा। सच तो यह है कि मांड नदी को जितना नुकसान माफिया की मशीनों ने नहीं पहुंचाया, उससे कहीं अधिक जख्म प्रशासन की आपराधिक चुप्पी और अनदेखी ने दिए हैं।

आने वाले मानसून और बारिश के सीजन को देखते हुए इन दिनों मांड नदी में अवैध रेत खनन का खेल ‘युद्धस्तर’ पर पहुंच गया है। नदी को पूरी तरह से लूटने के लिए माफिया के इशारे पर तड़के सुबह से लेकर आधी रात तक ट्रैक्टरों और डंपरों का तांडव जारी है। माफियाओं ने स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को बाकायदा ठेके पर लगा रखा है। सुबह होते ही तेलाइधार, राधापुर, महारानीपुर, सलाईनगर और हर्रामार के इलाकों से बहने वाली मांड नदी और नालों से रेत का अवैध उत्खनन शुरू हो जाता है। दिनभर लूटी गई इस रेत को पहले शहर के आस-पास बनाए गए अवैध बालू डिपो में डंप किया जाता है, और फिर रात के अंधेरे में हाईवा और टिपर जैसे बड़े वाहनों के जरिए बाहरी इलाकों में खपाकर चांदी काटी जा रही है।

इस पूरी लूट पर प्रशासनिक अमले की मुस्तैदी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिनों पूर्व खनिज विभाग ने महज ‘कार्रवाई का दिखावा’ करते हुए नौ ट्रैक्टरों को जब्त किया था। लेकिन अधिकारियों की हिम्मत इतनी भी नहीं हुई कि वे शहर से सटे उन अवैध रेत डिपो पर छापा मार सकें, जिनके बारे में बच्चा-बच्चा जानता है। अधिकारी इस सच से भली-भांति वाकिफ हैं कि डिपो भले ही कागजों पर वैध दिखाए जा रहे हों, लेकिन वहां जमा लाखों टन बालू पूरी तरह अवैध है। इसके बावजूद कार्रवाई न होना अधिकारियों की संदेहास्पद भूमिका और माफिया से उनकी मिलीभगत को साफ उजागर करता है। जब तक शासन-प्रशासन इस तबाही के असली संरक्षकों पर हाथ नहीं डालेगा, तब तक क्षेत्र की जीवनदायिनी का सीना यूं ही छलनी होता रहेगा।
इस पूरे गंभीर मामले और प्रशासनिक लापरवाही पर जब जिला खनिज अधिकारी अनिल साहू से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह एक रटा-रटाया और औपचारिक बयान देते हुए कह दिया कि “वे जल्द ही टीम भेजकर मामले की जांच कराएंगे।” अधिकारियों का यह ढुलमुल रवैया यह बताने के लिए काफी है कि मांड नदी को मिटाने में सरकारी तंत्र कितना गंभीर है।
