– विभागीय स्टॉल के नाम पर 20-20 हजार रुपये वसूली की चर्चा
जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस जैसे गौरवशाली अवसर पर जिला प्रशासन ऐसा राज्योत्सव आयोजित करने जा रहा है, जिसकी तैयारियों से उत्साह कम और सरकारी औपचारिकता ज्यादा नजर आ रही है। 2 नवंबर को शासकीय हाई स्कूल मैदान में होने वाले जिला स्तरीय राज्योत्सव का कार्यक्रम महज पांच घंटे में सिमटता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि जिस आयोजन के जरिए छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला और उपलब्धियों का प्रदर्शन होना चाहिए, वह आखिर एक सामान्य सरकारी कार्यक्रम बनकर क्यों रह गया?
कार्यक्रम की रूपरेखा पर नजर डालें तो दोपहर 3 बजे स्कूली बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और शाम 7 बजे छत्तीसगढ़ी गायक सुनील मानिकपुरी की प्रस्तुति प्रस्तावित है। इसके अलावा किसी बड़े कलाकार या चर्चित सांस्कृतिक हस्ती को आमंत्रित नहीं किया गया है। ऐसे में लाखों रुपये खर्च होने वाले आयोजन में आकर्षण आखिर क्या होगा? क्या राज्योत्सव का उद्देश्य केवल अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति दर्ज कराना रह गया है?
हैरानी की बात यह भी है कि आयोजन को लेकर शहर में कोई खास उत्सुकता दिखाई नहीं दे रही है। प्रचार-प्रसार भी उस स्तर पर नजर नहीं आ रहा, जिससे आम नागरिकों में उत्सव का माहौल बन सके। राज्योत्सव जैसे बड़े आयोजन के लिए व्यापक प्रचार, स्थानीय कलाकारों को मंच और प्रदेश की लोकसंस्कृति की झलक जरूरी थी, लेकिन तैयारियां देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन ने जिम्मेदारी निभाने के लिए कार्यक्रम की खानापूर्ति करना ही पर्याप्त समझ लिया है।
विभागीय स्टॉल के नाम पर वसूली की चर्चा
इस आयोजन में विभागीय स्टॉल लगाने के नाम पर विभिन्न विभागों से 20-20 हजार रुपये तक लिए जाने की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि और वास्तविकता की जांच जरूरी है। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल उठना लाजिमी है कि सरकारी आयोजन में विभागों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ क्यों डाला जा रहा है? इस राशि का उपयोग किस मद में होगा और खर्च का हिसाब कौन देगा?
राज्योत्सव केवल मंच, माइक और अतिथियों के स्वागत तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह छत्तीसगढ़ की अस्मिता, संस्कृति और गौरव का उत्सव है। लेकिन जांजगीर में इसकी तैयारियां देखकर सवाल उठ रहा है कि प्रशासन उत्सव मना रहा है या सिर्फ सरकारी कैलेंडर में एक आयोजन पूरा करने की औपचारिकता निभा रहा है?
बड़ा सवाल यह है कि जब आयोजन पर लाखों रुपये खर्च होने हैं, तो आम जनता को आकर्षित करने और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भव्य मंच देने में प्रशासन की दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई दे रही?
