नई दिल्ली। राजधानी नई दिल्ली से एक बड़ी राजनीतिक हलचल में, केंद्र सरकार के एक प्रमुख राज्य मंत्री ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इस्तीफा देने वाले नेता भारत सरकार में रेल राज्य मंत्री और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के पोते हैं और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की ओर से राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं।
पंजाब की राजनीति में एक मजबूत पहचान रखने वाले इस वरिष्ठ नेता का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने अपने संसदीय करियर की शुरुआत साल 2009 में कांग्रेस के टिकट पर आनंदपुर साहिब लोकसभा सीट से जीतकर की थी। इसके बाद वे 2014 और 2019 के आम चुनावों में पंजाब की प्रतिष्ठित लुधियाना सीट से लगातार सांसद चुने गए। हालांकि साल 2017 में उन्होंने जलालाबाद से पंजाब विधानसभा चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वहां उन्हें सुखबीर सिंह बादल के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। आगे चलकर साल 2021 में उन्हें लोकसभा में कांग्रेस के नेता के रूप में काम करने का महत्वपूर्ण दायित्व भी सौंपा गया था।
साल 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें पुनः लुधियाना सीट से मैदान में उतारा, जहाँ उनका मुकाबला कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वारिंग से हुआ। इस चुनाव में हार का सामना करने के बावजूद, भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने उन पर भरोसा बनाए रखा और मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में उन्हें सीधे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करते हुए रेल राज्य मंत्री और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री की दोहरी जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद उन्हें राजस्थान से राज्यसभा भेजकर संसद का सदस्य बनाया गया।
संसदीय जीवन के साथ-साथ वे लगातार सुरक्षा संबंधी खतरों और विवादों के कारण भी चर्चा में रहे। उन्हें अपने राजनीतिक जीवन में दो बार जान से मारने की धमकियां मिलीं। जनवरी 2021 में कृषि कानूनों के विरोध के दौरान सिंघु बॉर्डर पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन पर प्रत्यक्ष हमला हुआ था। इसके बाद साल 2023 में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय व्हाट्सएप कॉल के जरिए बम से उड़ाने की धमकी भी दी गई थी। इन तमाम सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद वे पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति में लगातार सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। अब उनके अचानक इस्तीफे के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि संगठन या आगामी रणनीतियों में उन्हें कोई नई भूमिका सौंपी जा सकती है।
