जांजगीर-चांपा । जिला जेल खोखरा में दुष्कर्म के आरोपी दुवास केवट की संदिग्ध आत्महत्या अब सीधे-सीधे पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप बनकर सामने आए है। सवाल साफ है,यह आत्महत्या थी या पुलिसिया दबाव और भ्रष्ट सिस्टम का नतीजा?
परिजनों के आरोप बेहद सनसनीखेज हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने युवक को कार्रवाई से बचाने के नाम पर 20 हजार रुपये की मांग की। घर में नकद नहीं था, तो जेवर बेचकर रकम जुटाई गई। पैसे लेने के बाद भी पुलिस ने युवक को जेल भेज दिया, और अगले ही दिन जेल के भीतर उसकी लाश फंदे पर लटकती मिली। अगर यह सच है, तो यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि खुली वसूली और अमानवीय उत्पीड़न का मामला है। बलौदा पुलिस के विवेचना ने बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। जिस पुलिस जवान द्वारा युवक की गिरफ्तारी हुई थी क्या उस पुलिस आरक्षक से पूछताछ हुई है। मृतक के मां का आरोप है कि घटना की हर एक पहलुओं में जांच होनी चाहिए।
दूसरी ओर सबसे बड़ा सवाल जेल के भीतर फांसी लगाने की सामग्री कहां से आई? निगरानी में पुलिस कहां थी? क्या जेल और पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से सब कुछ आंख मूंदकर होने दिया गया? पुलिस का कहना है जांच जारी है, लेकिन जांच उसी सिस्टम से, जिस पर आरोप हैं। यह खुद में एक मजाक है।
पुलिस का आरोप:
मृतक युवक द्वारा नाबालिग बालिका को बहला-फुसलाकर भगा ले जाकर अनाचार किया। रिपोर्ट के बाद आरोपी युवक दुवास केंवट को कोरबा से गिरफ्तार किया गया। आरोपी के विरुद्ध धारा 64, 64(M), 65(1), 69 BNS एवं धारा 4, 6 पाक्सो एक्ट कार्यवाही कर न्यायिक रिमांड पर भेजा गया। आरोपी दुवास केंवट पिता संतोष केंवट उम्र 21 साल निवासी जवाली, थाना बाकीमोंगरा जिला कोरबा है।
मामला क्या था…
प्रार्थी ने थाना बलौदा में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसकी नाबालिग बालिका दिनांक 05.03.26 को बिना बताए घर से कहीं चली गई है, किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा बहला फुसलाकर कर भगा ले जाने की सूचना पर थाना बलौदा में अपराध क्र. 107/2026 धारा 137(2) BNS के तहत मामला दर्ज कर विवेचना शुरू की गई। इस कार्रवाई में पुलिस द्वारा कथित प्रेस विज्ञप्ति द्वारा कार्रवाई में सराहनीय योगदान करने वाले थाना प्रभारी निरीक्षक मनोहर सिन्हा, सउनि कौशल सिदार, महिला प्र.आर. रामकुमारी मार्को, आरक्षक रज्जू रात्रे, लखेश विश्वकर्मा व म.आर. चंद्रप्रभा शांते के खिलाफ में भी जांच होनी चाहिए।
अब पूरे मामले में पुलिस के खिलाफ सवाल खड़े हो रहे है, क्या इस मौत की जिम्मेदारी तय होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा? अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह साफ माना जाएगा कि खाकी ने फिर एक गरीब की आवाज दबा दी।
