नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट ने देश के मंदिरों में जारी ‘वीआईपी दर्शन’ की व्यवस्था पर एक बेहद अहम और तल्ख मौखिक टिप्पणी की है, जिसने एक नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने सीधे शब्दों में पूछा है कि जब भगवान के सामने हर इंसान बराबर है, तो मंदिरों में वीआईपी (VIP) और विशेष दर्शन जैसी अलग व्यवस्थाएं क्यों होनी चाहिए? इस व्यवस्था के कारण उन आम श्रद्धालुओं को घंटों मंदिर के बाहर इंतजार करना पड़ता है, जो पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की एक झलक पाने आते हैं।
जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी विश्व हिंदू परिषद (VHP) की उत्तर तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पी. चोक्कलिंगम द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस याचिका में मांग की गई है कि वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों, गर्भवती महिलाओं, नवविवाहित जोड़ों, राज्य के प्रमुखों और संवैधानिक पदाधिकारियों को छोड़कर बाकी सभी के लिए वीआईपी और विशेष दर्शन की व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत का रुख मंत्रियों और वीआईपी वर्ग के विशेषाधिकारों को लेकर काफी सख्त नजर आया। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि मंत्रियों और विधायकों को यह भ्रम बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि वे किसी भी वक्त मंदिर में आ सकते हैं और भगवान वहां बैठकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसके साथ ही कोर्ट ने पिछले दिनों आई उस मीडिया रिपोर्ट पर भी संज्ञान लिया, जिसमें पूछा गया था कि क्या 15 मई को किसी मंत्री के आगमन के कारण तिरुपरंकुंद्रम सुब्रमण्यस्वामी मंदिर के कपाट बंद होने का समय आगे बढ़ाया गया था।
हालांकि, सरकार की ओर से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने कोर्ट के समक्ष एक रिपोर्ट पेश करते हुए स्पष्ट किया कि मंदिर के समय में ऐसा कोई बदलाव नहीं किया गया था। सरकार ने इस मामले पर अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कोर्ट से समय मांगा है, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई को छह हफ्तों के लिए टाल दिया है।
कानूनी और धार्मिक आधार पर टिकी यह याचिका आने वाले समय में देश के मंदिरों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। याचिकाकर्ता पी. चोक्कलिंगम का तर्क है कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 6(15)(b) के तहत उनकी यह अर्जी पूरी तरह विचार योग्य है। उन्होंने सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का हवाला देते हुए याचिका में लिखा है कि हमारा धर्म जाति, आर्थिक संपन्नता या सामाजिक हैसियत के आधार पर मनुष्यों में कोई भेद नहीं करता।
सनातन धर्म हर व्यक्ति को एक समान मानने की शिक्षा देता है, इसलिए मंदिरों के गर्भगृह के सामने अमीर-गरीब या वीआईपी और आम श्रद्धालु की दीवार खड़ी करना धार्मिक सिद्धांतों के भी खिलाफ है। अब देखना यह होगा कि छह हफ्ते बाद होने वाली अगली सुनवाई में राज्य सरकार इस पर क्या स्टैंड लेती है।
