जगदलपुर। बस्तर में मानसून की पहली फुहार पड़ते ही यहां के सुदूर वनांचलों की रंगत पूरी तरह बदल गई है। बारिश की बूंदों के साथ ही बस्तर के घने जंगलों से देश की सबसे महंगी और दुर्लभ सब्जियों में शुमार ‘बोड़ा’, जंगली मशरूम ‘फुटु’ और बांस की कोपलें यानी ‘करील’ मिलने का सिलसिला शुरू हो चुका है। यह मौसम बस्तर के हजारों ग्रामीण परिवारों के लिए न सिर्फ स्वाद का उत्सव लेकर आता है, बल्कि उनकी आजीविका का भी सबसे बड़ा सहारा बनता है। खासकर ‘बोड़ा’ की मांग इस कदर होती है कि शुरुआती सीजन में शहरी बाजारों में इसकी कीमत 1500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है, जो इसे बस्तर का सबसे महंगा और प्रीमियम वन उत्पाद बनाती है।
इन अनूठे और प्राकृतिक पकवानों को सहेजने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह होते ही एक अलग ही चहल-पहल देखने को मिलती है। महिलाएं और बच्चे अपनी पारंपरिक टोकरियां लेकर घने जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद जमीन के भीतर से ‘बोड़ा’ और सूखी पत्तियों के बीच से ‘फुटु’ एकत्र करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। यह वनोपज बस्तर के आदिवासियों के पारंपरिक भोजन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रिय हिस्सा है। सालों से चली आ रही यह परंपरा केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों की खाद्य सुरक्षा और पोषण की एक मजबूत ढाल भी बनी हुई है।
पोषण के मामले में जंगल से मिलने वाली यह सौगात किसी सुपरफूड से कम नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, फुटु और बोड़ा में उच्च मात्रा में प्रोटीन, विटामिन-बी और पोटैशियम पाया जाता है। वहीं, बांस की करील भी फाइबर, प्रोटीन और पोटैशियम का एक समृद्ध स्रोत है। यही वजह है कि मानसून के इन तीन महीनों में यह उत्पाद न केवल ग्रामीणों की सेहत दुरुस्त रखते हैं, बल्कि स्थानीय बाजारों में इनकी भारी मांग के कारण यह ग्रामीणों की आय का भी एक बड़ा और मजबूत जरिया बन जाते हैं। प्रकृति का यह अनूठा उपहार हर साल बस्तर की अर्थव्यवस्था और संस्कृति को एक नई रफ्तार देता है।
