वॉशिंगटन. वॉशिंगटन के गलियारों से दशकों बाद एक ऐसी खबर आई जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति में उम्मीद की नई किरण जगा दी है, लेकिन युद्ध की कड़वी हकीकत अब भी बरकरार है. अमेरिका की मध्यस्थता में करीब तीन दशक बाद इजराइल और लेबनान के बीच हुई पहली सीधी और प्रत्यक्ष वार्ता का दौर संपन्न हो गया है.
हालांकि, कूटनीति की मेज पर शुरू हुई यह बातचीत फिलहाल सीमा पर गरजती तोपों को शांत करने में नाकाम रही है, क्योंकि युद्धविराम को लेकर कोई भी पक्ष किसी ठोस समझौते पर नहीं पहुंच सका. दो घंटे तक चली इस ऐतिहासिक बैठक के बाद इजराइली राजदूत येचिएल लेइटर ने लेबनानी राजदूत नादा हमादेह के साथ हुई चर्चा को “अत्यधिक सकारात्मक” करार दिया है, जिसमें भविष्य के लिए कई प्रस्तावों की नींव रखी गई है.
शांति की इस मेज पर जहां एक ओर मुस्कुराहटें और सकारात्मक संकेत थे, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा की कठोर शर्तें भी मौजूद रहीं. इजराइल ने साफ कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के साथ रत्ती भर भी समझौता नहीं करेगा. राजदूत लेइटर ने दोटूक लहजे में कहा कि जब तक सीमा पार से उनके नागरिकों पर खतरा बना रहेगा, सैन्य कार्रवाई पर विराम लगाने का सवाल ही नहीं उठता. हिज्बुल्लाह की घटती ताकत का जिक्र करते हुए इजराइल ने अपना पलड़ा भारी रखने की कोशिश की है, लेकिन साथ ही भविष्य में लेबनान के साथ औपचारिक संबंधों की एक धुंधली सी मगर उम्मीद भरी खिड़की भी खुली छोड़ दी है.
फिलहाल, दोनों देशों के प्रतिनिधि अपने-अपने प्रस्तावों के साथ स्वदेश लौटेंगे, जहां सरकारों के विचार-मंथन के बाद अगले दौर की तैयारी होगी. लेबनान की सरकारी एजेंसी ने भी इसे तनाव कम करने की दिशा में एक शुरुआती कदम माना है, जिससे यह साफ है कि भले ही आज बंदूकें शांत न हुई हों, लेकिन बातचीत का रास्ता खुलना ही अपने आप में एक बड़ी कूटनीतिक जीत है.
