गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ के शासकीय स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र से प्रार्थना सभा के दौरान मंत्र जाप और सरस्वती वंदना अनिवार्य किए जाने के सरकारी आदेश के खिलाफ मुस्लिम समाज ने मोर्चा खोल दिया है। जिला मुख्यालय में मुस्लिम विकास मंच के अध्यक्ष असद सिद्दीकी के नेतृत्व में समाज के सैकड़ों लोगों ने हाथों में ‘तुगलकी फरमान वापस लो’ लिखी तख्तियां लेकर एक विशाल मौन रैली निकाली। शांतिपूर्ण ढंग से जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे इस विरोध मार्च ने राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन सौंपकर स्कूल शिक्षा विभाग के इस विवादित आदेश को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।
यह पूरा विवाद छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा बीते 12 जून को जारी किए गए उस आदेश के बाद उपजा है, जिसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सभी सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना के साथ भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र और गुरु मंत्र के जाप को अनिवार्य कर दिया गया है। मुस्लिम समुदाय ने इस निर्णय को एकतरफा और थोपा हुआ बताते हुए दावा किया है कि इस व्यवस्था को तीन चरणों में लागू करने की योजना बनाई जा रही है, जो पूरी तरह से देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।
विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों का मुख्य तर्क है कि यह आदेश सीधे तौर पर प्रत्येक नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 जहां हर व्यक्ति को अपनी आस्था और इबादत के तौर-तरीकों को चुनने की आजादी देता है, वहीं अनुच्छेद 28(1) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि सरकारी या राज्य के कोष से चलने वाले किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। समाज का आरोप है कि किसी एक विशेष धर्म की प्रार्थनाओं और मंत्रों को सभी विद्यार्थियों पर जबरन लागू करना इन संवैधानिक सुरक्षा कमियों का खुला उल्लंघन है।
इसके साथ ही इस फैसले को समानता के अधिकार के चश्मे से भी देखा जा रहा है। ज्ञापन में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि बहुसंख्यक समाज की धार्मिक पद्धतियों को अनिवार्य करने से अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राओं के मन में अलगाव और भेदभाव की भावना घर कर सकती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 द्वारा दिए गए समानता के अधिकार को चोट पहुंचाती है। अपनी मांगों को कानूनी मजबूती देने के लिए मुस्लिम समाज ने वर्ष 2002 के ऐतिहासिक ‘अरुणा राय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का भी संदर्भ दिया है, जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत ने सरकारी शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष धर्म के अनुष्ठानों या उपासना को बढ़ावा देने को पूरी तरह से अनुचित ठहराया था।
मुस्लिम विकास मंच ने स्पष्ट कर दिया है कि यह मौन जुलूस और ज्ञापन तो महज एक शांतिपूर्ण शुरुआत थी, लेकिन अगर सरकार अपनी हठधर्मिता पर अड़ी रही तो यह मामला सड़कों से निकलकर अदालत के गलियारों तक पहुंचेगा। संगठन के अध्यक्ष असद सिद्दीकी ने सरकार को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इस गैर-संवैधानिक आदेश के खिलाफ उनका अगला कदम एक व्यापक आंदोलन और न्यायालय की शरण में जाना होगा, क्योंकि जब चुनी हुई सरकारें ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ फैसले लेने लगें, तब न्याय के लिए अदालत ही आखिरी और एकमात्र उम्मीद बचती है।
