नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के सुदूर वनांचल में इस बार मानसून की आहट दहशत नहीं, बल्कि सहूलियत और उम्मीद लेकर आ रही है। जिस घने जंगल और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बारिश की पहली बूंद गिरते ही जिंदगी थम जाया करती थी और उफनते नदी-नाले ग्रामीणों को महीनों के लिए दुनिया से काट देते थे, वहां अब विकास की एक नई बयार बहने लगी है। इलाके से नक्सलवाद के खात्मे के बाद सुरक्षाबलों ने अब ग्रामीणों की जिंदगी संवारने का मोर्चा संभाल लिया है।
इसी कड़ी में आईटीबीपी (इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस) की 53वीं वाहिनी के जवानों ने नारायणपुर जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसने सदियों पुरानी प्रशासनिक सुस्ती को पीछे छोड़ दिया है। जवानों ने बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच रिकॉर्ड समय में सात मजबूत ‘लॉग ब्रिज’ (लकड़ी के पुल) तैयार कर दिए हैं।
यह महज लकड़ी के पुल नहीं हैं, बल्कि अबूझमाड़ के आदिवासियों के लिए जीवनदायिनी डोर हैं। अब मानसून के चार महीनों में न तो किसी बीमार या गर्भवती महिला को इलाज के लिए खाट पर लिटाकर उफनती नदी पार कराने का जोखिम उठाना पड़ेगा, और न ही कीचड़ व नालों के डर से मासूम बच्चों की पढ़ाई रुकेगी। इस पूरी मुहिम की शुरुआत तब हुई जब माड़ डिविजन के नवस्थापित सीओबी (फॉरवर्ड कैंप) कोडेनार, अडिंगपार और मड़ोड़ा क्षेत्र के ग्रामीणों ने आईटीबीपी के अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी बरसों पुरानी पीड़ा साझा की थी।
ग्रामीणों ने बताया था कि कैसे हर साल मानसून आते ही वे अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर हो जाते हैं। मामले की संवेदनशीलता और ग्रामीणों के दर्द को देखते हुए आईटीबीपी के कमांडेंट (सेनानी) ने बिना वक्त गंवाए त्वरित एक्शन लिया। अत्यंत दुर्गम और संवेदनशील इलाका होने के कारण यहां निर्माण सामग्री पहुंचाना और काम करना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन जवानों के हौसले और ‘क्विक एक्शन’ के आगे हर बाधा छोटी साबित हुई।
सुरक्षा और विकास के इस अनूठे समन्वय ने साबित कर दिया है कि जहां इरादे मजबूत हों, वहां नामुमकिन को भी मुमकिन बदला जा सकता है। इस बार की बारिश में अबूझमाड़ का वनांचल कटे रहने के अंधेरे में नहीं रहेगा, बल्कि कनेक्टिविटी की एक नई सुबह का गवाह बनेगा।
