कोंडागांव। बस्तर संभाग के ग्रामीण अंचलों की लोक-संस्कृति और अनूठी परंपराएं देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी एक अलग और अमिट पहचान रखती हैं। इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की एक जीवंत बानगी इन दिनों कोंडागांव जिले के ग्राम बरकई में देखने को मिली, जहां पारंपरिक “बंधा मतौर” उत्सव के दौरान पूरा इलाका उत्सव के रंग में डूब गया। हर तीन साल में आयोजित होने वाले इस अनूठे कार्यक्रम में इस बार एक नया रिकॉर्ड बना, जब आस्था और रोमांच के वशीभूत होकर 5000 से अधिक ग्रामीण और सैलानी एक साथ तालाब के पानी में उतरे। पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही ढोल-नगाड़ों की थाप गूंजी, तालाब की मछलियां मानो लोक-संगीत की धुन पर पानी की सतह से ऊपर उछलने लगीं। इसके तुरंत बाद पारंपरिक औजारों और जालों के साथ ग्रामीणों का हुजूम पानी में उतरा और देखते ही देखते यह पूरा आयोजन सामूहिक लोक-एकता की एक भव्य मिसाल बन गया।
इस ऐतिहासिक परंपरा की जड़ें दशकों पुरानी हैं, जब ग्राम बरकई के तत्कालीन मालगुजारों ने ग्रामीणों के सामूहिक श्रमदान से इस विशाल तालाब का निर्माण करवाया था। तालाब के पूरा होने पर मालगुजारों ने सामाजिक समरसता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए एक नियम बनाया कि हर तीन वर्ष में एक बार इस जलाशय की तमाम मछलियां गांववासियों और यहां पहुंचने वाले मेहमानों के लिए छोड़ दी जाएंगी। तभी से “बंधा मतौर” की यह रीत पूरी शिद्दत से निभाई जा रही है। इस बार भी आयोजन में हिस्सा लेने और तालाब में उतरकर मछली पकड़ने के लिए प्रत्येक प्रतिभागी से 200 रुपये का सहयोग शुल्क लिया गया था, जिसके बाद तय समय पर हजारों लोग पानी में रोमांच की तलाश में कूद पड़े।

इस अद्भुत कार्यक्रम की शुरुआत हमेशा की तरह गांव के मालगुजार, पुजारी और पटेल द्वारा ग्राम देवी की सविधि पूजा-अर्चना के साथ हुई। बस्तर की मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद बजने वाले ढोल-नगाड़ों की थाप सुनते ही मछलियां पानी में छलांग लगाने लगती हैं, जो इस पूरे आयोजन का सबसे जादुई और मुख्य आकर्षण माना जाता है। स्थानीय बुजुर्गों का दावा है कि पूरे बस्तर संभाग में बरकई एकमात्र ऐसा गांव है, जिसने आधुनिकता के दौर में भी “बंधा मतौर” की इस साझी विरासत को पूरी श्रद्धा, पवित्रता और उत्साह के साथ जिंदा रखा है।
इस वर्ष इस अनोखे दृश्य का गवाह बनने और सामूहिक मत्स्य आखेट का हिस्सा बनने के लिए न केवल कोंडागांव, बल्कि आसपास के कई जिलों से भी रिकॉर्ड तादाद में लोग पहुंचे थे। पानी से सीधे पकड़ी गई ताजी मछलियां ग्रामीण बेहद चाव और खुशी के साथ अपने घरों को ले गए। आयोजन समिति ने बताया कि हर बीतते साल के साथ इस पारंपरिक मेले की लोकप्रियता और जनभागीदारी का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए आने वाले वर्षों में इसे राजकीय पर्यटन मानचित्र पर उभारने और अधिक भव्य रूप देने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। उत्सव के अंतिम पड़ाव पर, परंपरा के अनुसार गांव के मालगुजार द्वारा तालाब के पानी को पवित्र स्पर्श देकर “बंधा मतौर” के समापन की आधिकारिक घोषणा की गई, जिसे सभी ग्रामीणों ने सिर झुकाकर स्वीकार किया।
