कोरबा। विकास की वेदी पर एक बार फिर उन परिवारों की सुगबुगाहट तेज हो गई है, जो करीब साढ़े चार दशक पहले अपना सब कुछ छोड़कर यहां आए थे। नगर पालिक निगम कोरबा के बरमपुर (आजाद नगर) में पिछले 46 वर्षों से रह रहे जरहाजेल के विस्थापित परिवारों पर अब सड़क चौड़ीकरण के नाम पर बेदखली की तलवार लटक रही है। इस प्रशासनिक आदेश के विरोध में सोमवार को छत्तीसगढ़ किसान सभा के नेतृत्व में प्रभावित परिवारों ने दर्री तहसीलदार को एक ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि बिना वैकल्पिक बसावट, उचित मुआवजे और पुख्ता पुनर्वास के वे एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।
इस पूरे मामले की जड़ें साल 1980 से जुड़ी हैं। तब एसईसीएल (SECL) द्वारा जरहाजेल गांव की जमीन अधिग्रहित किए जाने के बाद इन ग्रामीणों को आजाद नगर में बसाया गया था। अब इतने लंबे समय बाद उन्हें एक बार फिर उजाड़ने की तैयारी की जा रही है, जिससे पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का माहौल है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने इस प्रशासनिक रवैये को अमानवीय करार दिया है।
उन्होंने कहा कि बिना किसी ठोस पुनर्वास नीति के लोगों को उनके घरों से बेदखल करना न्यायसंगत नहीं है। किसान सभा की मांग है कि इस बेदखली आदेश पर तुरंत रोक लगाई जाए और किसी भी कार्रवाई से पहले हर प्रभावित परिवार को पक्का मकान, वैकल्पिक जमीन और उचित मुआवजा दिया जाए।
सालों से इस दर्द को झेल रहे विस्थापित किसान इंद्रप्रकाश कैवर्त और घासीराम कैवर्त की आपबीती भी विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। उनका कहना है कि 1980 में जब उनका गांव छूटा था, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन आज भी कई परिवार रोजगार और स्थायी पुनर्वास जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के दोबारा बेदखल करने की कोशिशों का वे हर स्तर पर विरोध करेंगे।
किसान सभा ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि यदि प्रभावित परिवारों को जबरन हटाने का प्रयास किया गया, तो संगठन चुप नहीं बैठेगा और उग्र आंदोलन करते हुए सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा। इस दौरान अपनी आवाज बुलंद करने वालों में रेशम लाल यादव, दामोदर श्याम, शिवप्रसाद, अनूप कुमार, राजू कैवर्त, सुशील कुमार, गौतम यादव सहित बड़ी संख्या में प्रभावित ग्रामीण एकजुट नजर आए।
