जांजगीर-चांपा। जिले के ग्राम सरखो के मूल निवासी रामसनेही राठौर ने मड़वा पावर प्लांट प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी पुश्तैनी भूमि तेंदुभाठा का अधिग्रहण कर वर्षों पहले मुआवजा तो दे दिया गया, लेकिन आज तक एक भी सदस्य को नौकरी नहीं दी गई, जबकि इसी गांव के कई लोगों को प्लांट में रोजगार दिया गया है। रामसनेही राठौर ने जनदर्शन में कलेक्टर से शिकायत कर नौकरी नहीं मिलने पर परिवार के साथ सामूहिक आत्मदाह करने की अनुमति मांगा हैं।
रामसनेही राठौर के अनुसार उनके पिता रामलाल राठौर के नाम दर्ज भूमि खसरा नंबर 1067, 1072/3 (रकबा 0.43 एकड़) का मुआवजा वर्ष 2011 में, खसरा नंबर 1139/1 (रकबा 0.10 एकड़) का मुआवजा वर्ष 2015 में दिया गया। वहीं उनकी पत्नी सरिता राठौर के नाम से दर्ज खसरा नंबर 1139/1 में से 0.10 एकड़ भूमि का मुआवजा वर्ष 2020 में प्रदान किया गया। तीन खातों की जमीन अधिग्रहित होने के बावजूद एक भी नौकरी नहीं दी गई।
पीड़ित का आरोप है कि जब भी वह नौकरी की मांग लेकर प्लांट प्रबंधन के पास गया और आईटीआई सहित सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए, तो अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा तुम लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी, मुआवजा मिल चुका है। यह बयान न केवल अमानवीय है, बल्कि विस्थापन नीति और सामाजिक न्याय के खिलाफ भी है।
रामसनेही की छह बेटियां हैं, जिनमें से तीन आईटीआई क्वालिफाइड हैं। वर्षों से नौकरी के इंतजार में बेटियों की शादी तक नहीं हो पा रही है। आर्थिक और मानसिक दबाव इस कदर बढ़ गया है कि परिवार आत्महत्या जैसे खतरनाक विचारों तक पहुंच गया है।
इतना ही नहीं, पावर प्लांट से निकलने वाली राखड़ खेतों में डाले जाने से खेती-किसानी भी बर्बाद हो रही है। बार-बार शिकायत के बावजूद न तो प्रशासन सुन रहा है, न ही प्लांट प्रबंधन।
अब सवाल यह है—क्या भू-अधिग्रहित परिवारों को केवल मुआवजे के नाम पर चुप करा दिया जाएगा? या फिर प्रशासन इस गंभीर मामले में हस्तक्षेप कर पीड़ित परिवार को उसका हक दिलाएगा?
