सूरजपुर। छत्तीसगढ़ में कथित तौर पर ‘सुशासन’ का ढिंढोरा पीटने वाली विष्णुदेव साय सरकार की नाक के नीचे लापरवाही और प्रशासनिक संवेदनहीनता का ऐसा नंगा नाच चल रहा है, जिसने ग्रामीण जनता का जीना मुहाल कर दिया है। सूरजपुर जिले का नमदगिरी फीडर आज किसी तकनीकी खराबी का शिकार नहीं, बल्कि बिजली विभाग के निकम्मेपन और अफसरों की तानाशाही का सबसे बड़ा जीता-जागता स्मारक बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में हफ्तों से जारी अघोषित, अनियंत्रित और ताबड़तोड़ बिजली कटौती ने सैकड़ों परिवारों के जनजीवन को नरक बना दिया है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि जिस छत्तीसगढ़ के कोयले की छाती चीरकर देश के दूसरे राज्यों के वीआईपी बंगले रोशन हो रहे हैं, उसी छत्तीसगढ़ का अन्नदाता और आम नागरिक आज लालटेन युग में जीने को मजबूर है। आखिर बिजली विभाग के इन सफेद हाथी बन चुके अफसरों और नेताओं की साठगांठ का खामियाजा जनता कब तक भुगतेगी?
विभाग की इस घोर लापरवाही का आलम यह है कि सरस्वतीपुर, रामनगर, रामपुर, रुनियाडीह, सोहागपुर, करंजी, खरसुरा और खुद नमदगिरी समेत दर्जन भर से अधिक गांवों में सुबह की पहली किरण से लेकर देर आधी रात तक कब बिजली गायब हो जाए और कब आ जाए, इसका कोई माई-बाप नहीं है। अघोषीत कटौती का आलम यह है कि लोगों को पूरी-पूरी रात उमस और भीषण गर्मी में जागकर काटनी पड़ रही है। बिजली गुल करने से पहले उपभोक्ताओं को सूचना देना तो दूर, साहबों को यह बताना भी अपनी तौहीन लगता है कि आखिर किस ‘महा-मेंटेनेंस’ के नाम पर जनता का खून चूसा जा रहा है। बारिश शुरू होते ही इस विभाग की तथाकथित तैयारियों की पोल ऐसे खुली है जैसे कोई ताश का महल ढह गया हो। मानसून से पहले मेंटेनेंस के नाम पर घंटों शटडाउन लेने वाले ये निकम्मे अफसर अब जनता को जवाब देने से बच रहे हैं कि जब काम हुआ था, तो पहली फुहार में ही पूरी व्यवस्था वेंटिलेटर पर क्यों चली गई?
इस अंधेरगर्दी की सबसे करारी चोट समाज के सबसे कमजोर तबके बुजुर्गों, मासूम बच्चों और गंभीर मरीजों पर पड़ रही है। इस उमस भरी दमघोंटू गर्मी में जब घरों के भीतर सांस लेना दूभर है, तब इनवर्टर और मोबाइल तक चार्ज नहीं हो पा रहे हैं। ग्रामीण भारत को डिजिटल बनाने का दावा करने वाली सरकार को आकर देखना चाहिए कि यहां मोबाइल नेटवर्क और संचार व्यवस्था ठप पड़ी है क्योंकि टावरों को जिंदा रखने के लिए बिजली ही नदारद है। हद तो तब हो जाती है जब शहरी क्षेत्रों को चमकाने के लिए ग्रामीण इलाकों की बिजली की बलि चढ़ा दी जाती है। क्या ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ता टैक्स नहीं देते या वे इस राज्य के नागरिक नहीं हैं? शहरों को निर्बाध आपूर्ति और गांवों को अंतहीन अंधेरा-यह भेदभाव साय सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के खोखले नारे के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यदि कोई तकनीकी खराबी है भी, तो उसका शेड्यूल सार्वजनिक करने में अफसरों की हेकड़ी आड़े क्यों आ रही है?
जब परेशान और त्रस्त ग्रामीण बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और तथाकथित जनसेवकों को फोन लगाते हैं, तो या तो उनके फोन वीआईपी टोन में व्यस्त बताते हैं या फिर वे जनता की शिकायतों को कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। हर बार सिर्फ एक ही रटा-रटाया आश्वासन मिलता है कि ‘काम चल रहा है’, लेकिन वह काम धरातल पर कभी दिखाई नहीं देता। इस प्रशासनिक तानाशाही ने छोटे दुकानदारों, कुटीर उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की कमर तोड़कर रख दी है। किसानों की फसलें सिंचाई के अभाव में दम तोड़ रही हैं, व्यापारियों को रोजाना हजारों का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है, और छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो चुकी है। यह साफ तौर पर जनता की जेब पर डकैती और उनके अधिकारों का हनन है, जिसे एसी कमरों में बैठे बड़े अधिकारी अपनी बंद आंखों से देख रहे हैं।
इस पूरी तबाही में सबसे बड़ा और चुभता हुआ यक्ष प्रश्न यह है कि ऊर्जा विभाग की कमान खुद सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के हाथों में है। जब विभाग खुद मुख्यमंत्री के पास हो और तब राज्य की यह दुर्दशा हो, तो इसे सुशासन कहेंगे या प्रशासनिक पंगुता? जिन अफसरों को जनता की सेवा के लिए तैनात किया गया था, वे आज बेलगाम हो चुके हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वातानुकूलित (AC) दफ्तरों से बाहर निकलकर उन्हें जवाबदेही तय नहीं करनी है। साहबों को कभी अपनी मखमली जिंदगी से बाहर निकलकर, बिना पंखे और बिना लाइट के एक रात गुजारनी चाहिए, तब समझ आएगा कि नमदगिरी फीडर की जनता किस नरक को झेल रही है। यह महज बिजली की कटौती नहीं, बल्कि साय सरकार के प्रशासनिक इकबाल का दिवालियापन है। अगर जल्द ही नमदगिरी फीडर की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई, तो जनता का यह आक्रोश बिजली दफ्तरों को घेरने से पीछे नहीं हटेगा, और तब इस चिंगारी की आंच सीधे रायपुर के मंत्रालय तक पहुंचेगी।
