कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर क्षेत्र में स्थित ईरागांव इन दिनों धर्मांतरण की गतिविधियों को लेकर सुर्खियों में है। गांव में सामाजिक ताने-बाने और स्थानीय परंपराओं को बचाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए ग्रामसभा ने ईसाई धर्म प्रचारकों, पादरियों और पास्टरों के प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। ग्रामीणों ने इस फैसले को अमलीजामा पहनाते हुए बाकायदा गांव के प्रवेश मार्ग पर एक सूचना बोर्ड भी टांग दिया है, जो राहगीरों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
इस कड़े फैसले की पृष्ठभूमि कुछ दिन पहले हुई एक घटना से जुड़ी है। ग्रामीणों के मुताबिक, हाल ही में गांव की एक महिला की मौत के बाद शव को दफनाने को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया था। इस टकराव के बाद गांव की व्यवस्था संभालने के लिए ग्रामसभा की एक आपात बैठक बुलाई गई, जिसमें गहन चर्चा के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया। ग्रामीणों का तर्क है कि धर्म परिवर्तन करने के बाद कुछ लोग गांव की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं, पारंपरिक पूजा-पद्धति, स्थानीय देवी-देवताओं और सामाजिक नियमों से दूरी बना लेते हैं, जिससे शांतिपूर्ण माहौल में तनाव और टकराव की स्थिति पैदा होती है।
सांस्कृतिक पहचान और आपसी सद्भाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पारित किए गए इस प्रस्ताव के दौरान पूरा गांव एकजुट नजर आया। सूचना बोर्ड लगाने और इस ऐतिहासिक निर्णय के दौरान ग्राम पटेल प्रयाग सिंह कोरेटी, जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम, भागवत कोरेटी, मयाराम आंचला, पुखराज आंचला, गैंद सिंह हिडको, ज्वाला प्रसाद जैन, चैतू आंचला, बालसिंह कोरेटी और गौतम उसेण्डी सहित बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण प्रमुख रूप से मौजूद रहे।
