नई दिल्ली। भारत में जब भी महंगाई की आहट होती है, तो अमूमन सारा ध्यान कच्चे तेल की उछलती कीमतों पर जाकर टिक जाता है। लेकिन इस बार देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई पर एक ऐसा नया और गंभीर संकट मंडरा रहा है, जिसकी तरफ फिलहाल कम ही लोगों का ध्यान गया है। यह संकट है फर्टिलाइजर (खाद) की आसमान छूती कीमतें और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी सप्लाई चेन का टूटना। आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक मोर्चे पर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आने वाले कुछ महीनों में देश के भीतर सब्जियों, दालों और अनाजों के दामों में आग लग सकती है, जिससे आम जनता का घरेलू बजट पूरी तरह चरमरा जाएगा।
इस संकट की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव है, जिसने सीधे तौर पर भारत के आयात तंत्र को प्रभावित किया है। भारत अपनी फर्टिलाइजर जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, और इस खेप का मुख्य हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) के समुद्री रास्ते से होकर भारत पहुंचता है। हालिया युद्ध और खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण यह पूरा समुद्री मार्ग बुरी तरह बाधित हो चुका है। जहाजों की आवाजाही रुकने या रास्ता बदलने से खाद की खेप समय पर भारत नहीं पहुंच पा रही है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर यह गतिरोध लंबा खिंचा, तो भारत को फर्टिलाइजर के लिए वैश्विक बाजार में बहुत भारी कीमत चुकानी होगी।
चिंता की बात यह है कि फर्टिलाइजर का यह संकट अकेले नहीं आया है, बल्कि मौसम की अनिश्चितता ने इसकी मार को दोगुना कर दिया है। मौसम विभाग ने इस साल सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है, जिसके पीछे ‘एल नीनो’ (El Nino) के प्रभाव को एक बड़ा कारण माना जा रहा है। जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। कम बारिश और खाद की कमी का यह दोहरा कॉम्बिनेशन सीधे तौर पर देश के फसल उत्पादन को चोट पहुंचाएगा, जिससे मंडियों में अनाज और सब्जियों की आवक कम होना तय है।
इस संकट के शुरुआती संकेत मिलने भी शुरू हो गए हैं। भारत सरकार को हाल ही में लगभग 25 लाख टन यूरिया सामान्य से कहीं अधिक दरों पर आयात करना पड़ा है। इस महंगी खरीदारी का सीधा असर देश के खजाने पर पड़ेगा, क्योंकि सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद देने के लिए भारी-भरकम सब्सिडी देती है। चालू वित्त वर्ष में इस सब्सिडी के लिए करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, लेकिन एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के मौजूदा हालातों को देखते हुए सरकार का यह खर्च बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
बढ़ता हुआ यह फर्टिलाइजर बिल केवल खेती-किसानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश की पूरी मैक्रो-इकोनॉमी (समष्टि अर्थशास्त्र) को हिलाने की ताकत रखता है। खाद के महंगे आयात से देश का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ेगा। विदेशों को भुगतान करने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत होगी, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर पड़ सकता है। रुपया कमजोर होने से भारत के लिए अन्य जरूरी चीजों का आयात भी महंगा हो जाएगा, जो महंगाई के एक नए और खतरनाक दुष्चक्र को जन्म देगा। अब सबकी नजरें आने वाले मानसूनी महीनों पर टिकी हैं; यदि इंद्रदेव रूठे रहे और फर्टिलाइजर की कीमतें यूं ही बढ़ती रहीं, तो देश में खाद्य महंगाई का एक बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
