फटाफट डेस्क। तमिलनाडु की सियासत में आज एक ऐसा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिला है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राज्य के मुख्यमंत्री और डीएमके (DMK) के कद्दावर नेता एम. के. स्टालिन को उनके अपने ही गढ़ ‘कोलाथुर’ में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। विडंबना यह है कि स्टालिन के इस अजेय रथ को किसी और ने नहीं, बल्कि उनके पुराने साथी और रणनीतिकार रहे वी.एस. बाबू ने रोका है।
विजय थलपति की नवगठित पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए बाबू ने उस सीट पर जीत दर्ज की है, जिसे अब तक स्टालिन के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना जाता था। गौरतलब है कि साल 2011 में कोलाथुर सीट के गठन के बाद से स्टालिन यहाँ लगातार तीन बार जीत हासिल कर चुके थे, लेकिन इस बार अपने पूर्व सहयोगी के हाथों उन्हें शिकस्त झेलनी पड़ी।
इस हार के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। विजेता उम्मीदवार वी.एस. बाबू कभी स्टालिन के इतने करीबी थे कि 2011 के चुनाव में उन्होंने ही कोलाथुर में स्टालिन के चुनाव प्रभारी के रूप में कमान संभाली थी। समय का चक्र ऐसा घूमा कि पहले उन्होंने डीएमके छोड़ी और फिर इसी साल 7 फरवरी 2026 को विजय थलपति की पार्टी TVK का दामन थाम लिया।
डीएमके और एआईएडीएमके जैसी परंपरागत पार्टियों के बीच तीसरी शक्ति के रूप में उभरी TVK ने सीधे मुख्यमंत्री को पटखनी देकर राज्य की राजनीति में अपनी धमक पैदा कर दी है। एम. करुणानिधि की विरासत को आगे बढ़ाने वाले स्टालिन, जिन्होंने 2021 में आदि राजाराम को बड़े अंतर से हराया था, इस बार अपने ही पुराने ‘मैदान’ पर मात खा गए, जो तमिलनाडु के आने वाले राजनीतिक बदलाव की ओर बड़ा इशारा है।
