रायपुर। छत्तीसगढ़ की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के सचिवालय में मचे घमासान और चौतरफा विवादों के बाद आखिरकार अपनी विशेष सहायक रुही टेम्भुरकर की छुट्टी करने का फैसला तो ले लिया गया, लेकिन इस लेटलतीफ कार्रवाई ने मंत्री की प्रशासनिक क्षमता और अधिकारियों पर उनके नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 22 मई 2026 को जारी आदेश के तहत पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की उपायुक्त रुही टेम्भुरकर को तत्काल प्रभाव से उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया गया है। ढाई साल तक मंत्री के साए की तरह साथ रहने वाली इस अधिकारी को हटाए जाने के पीछे भले ही प्रशासनिक फेरबदल की दलील दी जा रही हो, लेकिन असल वजह लगातार गहराते जा रहे विवाद, बहुचर्चित साड़ी घोटाला और खुद बीजेपी संगठन के भीतर भड़का वो अंदरूनी आक्रोश है, जिसे दबा पाना अब मंत्री के बस से बाहर हो चुका था।
सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि मंत्री कार्यालय पूरी तरह बेलगाम हो चुका था और अधिकारियों पर लक्ष्मी राजवाड़े का कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। प्रदेश के सबसे चर्चित साड़ी वितरण विवाद में जिस तरह मंत्री कार्यालय की भूमिका पर उंगलियां उठीं, उसने न केवल सरकार की छवि धूमिल की बल्कि विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। इस घोटाले से सीधे तौर पर लक्ष्मी राजवाड़े का नाम बेहद खराब हुआ और संगठन के भीतर उनकी कार्यप्रणाली को लेकर भारी असहजता देखी जाने लगी।
हद तो तब हो गई जब मंत्री के अपने ही कार्यकर्ताओं के लिए उनके बंगले और दफ्तर के दरवाजे बंद हो गए। आरोप लग रहे हैं कि विशेष सहायक के जरिए एक ऐसा ‘दरबार’ चलाया जा रहा था, जहां आम कार्यकर्ताओं की सुनवाई पूरी तरह बंद थी। सूरजपुर भाजपा संगठन के कुछ बड़े नेताओं के वरदहस्त के कारण लंबे समय तक इस मनमानी को संरक्षण मिलता रहा, जिससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि मंत्री जी खुद अपने स्टाफ के आगे बेबस हैं।
ओएसडी को हटाकर डैमेज कंट्रोल की यह कोशिश लक्ष्मी राजवाड़े की राजनीतिक मुश्किलें कम करती नहीं दिख रही है, क्योंकि अब इसकी गूंज उनके खुद के विधानसभा क्षेत्र भटगांव में सुनाई देने लगी है। भटगांव के सुदूर वनांचल इलाकों जैसे ओडगी और बिहारपुर में आज विकास की रफ्तार पूरी तरह थम चुकी है, जिसे लेकर स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं में भारी उबाल है। इन दूरस्थ अंचलों में यह चर्चा अब आम हो चुकी है कि यदि मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का यही उपेक्षापूर्ण व्यवहार और आम लोगों से दूरी बनी रही, तो अगले चुनाव में उन्हें इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
वनांचल आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है और सीधा आरोप मंत्री पर मढ़ा जा रहा है कि वे क्षेत्र की सुध लेने के बजाय अपने ही दफ्तर के सिंडिकेट को संभालने में नाकाम साबित हुईं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केवल एक अधिकारी को हटा देने भर से विभाग में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार और लापरवाही के दाग नहीं धुलेंगे; अगर मंत्री ने अब भी अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदली और अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले दिन उनके लिए और भी ज्यादा तनावभरे होने वाले हैं।
