मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी। छत्तीसगढ़ के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में प्रशासनिक उपेक्षा और कथित ‘अधिकारी राज’ से नाराज होकर तीनों विकासखंडों के सरपंचों ने ग्राम सभा का पूर्ण बहिष्कार कर दिया है। जिला सरपंच संघ के बैनर तले एकजुट हुए जनप्रतिनिधियों ने न केवल जिला पंचायत और कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया, बल्कि मांगें पूरी न होने पर उग्र आंदोलन और सामूहिक इस्तीफे तक की दोटूक चेतावनी दे डाली है। सरपंचों का आरोप है कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सम्मान देने के बजाय प्रशासन उन पर अपनी मर्जी थोप रहा है और ग्राम सभा के प्रस्तावों को लगातार ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है।
यह आक्रोश उस समय और गहरा गया जब जिले भर के सरपंच बिना किसी नारेबाजी के शांतिपूर्ण ढंग से कलेक्टर कार्यालय के बाहर जमीन पर बैठकर मुलाकात का इंतजार कर रहे थे। जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र भुआर्य ने आरोप लगाया कि घंटों इंतजार के बाद भी कलेक्टर तूलिका प्रजापति उनसे मिलने नहीं आईं, बल्कि उनके सामने से ही गुजरकर सीधे अपने कक्ष में चली गईं। इससे पहले जब प्रतिनिधिमंडल जिला पंचायत सीईओ भारती चंद्राकर से मिलने पहुंचा था, तब वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। सरपंचों के अनुसार, सीईओ ने उनकी जमीनी समस्याओं को सुनने के बजाय पंचायत कार्यों, टैक्स कलेक्शन और महिला सरपंचों के परिजनों के दखल जैसे मुद्दों पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिससे नाराज होकर उन्हें कलेक्टर दफ्तर का रुख करना पड़ा।
प्रदर्शन के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के कार्यों के ऑडिट और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फैले कथित भ्रष्टाचार को लेकर सीधे तौर पर अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर हर निर्माण कार्य के लिए दो से पांच प्रतिशत तक का कमीशन अग्रिम रूप से मांगा जाता है। इसके बावजूद, भौतिक सत्यापन और मूल्यांकन पूरा होने के बाद भी फाइलों में तरह-तरह की तकनीकी कमियां निकालकर भुगतान को छह महीने से लेकर साल भर तक अटका कर रखा जाता है। सरपंचों को जनपद कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं और एक ही निर्माण कार्य से जुड़े नक्शा, खसरा और प्रस्ताव जैसे दस्तावेज छह-सात बार जमा कराने के बाद भी समय पर निराकरण नहीं होता।
सरपंचों ने अपनी चार सूत्रीय मांगों को रेखांकित करते हुए मानदेय में तत्काल वृद्धि की बात भी उठाई है। उनका कहना है कि राज्य और केंद्र सरकार की तमाम जमीनी योजनाओं के क्रियान्वयन की अतिरिक्त जिम्मेदारी तो पंचायतों पर डाल दी जाती है, लेकिन जनपद और जिला पंचायत स्तर से उन्हें कोई सहयोग या सम्मान नहीं मिलता। जनप्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि जमीनी हकीकत को देखते हुए यह ‘सुशासन’ नहीं बल्कि ‘कुशासन तिहार’ बन चुका है, जहां सिर्फ जनता के समय और संसाधनों की बर्बादी हो रही है। यदि इस प्रशासनिक मनमानी और कमीशनखोरी पर जल्द ही लगाम नहीं कसी गई, तो यह विरोध आने वाले दिनों में एक बड़े जिलाव्यापी आंदोलन का रूप ले लेगा।
