धमतरी। जिले भर में बुधवार को वात्सल्य और लोक-परंपरा का महापर्व हलषष्ठी (कमरछठ) पूरी आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। अपनी संतानों की लंबी उम्र, निरोगी काया और सुख-समृद्धि की कामना लेकर माताओं ने पूरे दिन निर्जला उपवास रखा। शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक का माहौल भगवान शिव-पार्वती और हलषष्ठी माता के भक्तिमय गीतों से गूंजता रहा।
शहर के आकाशगंगा कॉलोनी, महिमा सागर वार्ड, महात्मा गांधी वार्ड, आमापारा, बनियापारा, रामबाग, रामपुर, गोकुलपुर, टिकरापारा, सोरिद, बठेना, मकेश्वर वार्ड और रुद्री सहित विभिन्न मोहल्लों में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल रहा। पारंपरिक परिधानों और सोलह श्रृंगार से सजी महिलाओं ने धार्मिक स्थलों व सार्वजनिक चौराहों पर सामूहिक रूप से कुंडनुमा गड्ढा तैयार कर ‘सगरी’ की स्थापना की। सगरी को बेर, गूलर, पलाश और कुश की टहनियों से सजाया गया। इसके बाद वरुण कलश, गौरी-गणेश, भगवान महादेव और हलषष्ठी देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने सगरी में जल अर्पित कर श्रद्धापूर्वक परिक्रमा की और पारंपरिक लोकगीत गाते हुए संतान की रक्षा की प्रार्थना की।
पर्व के आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए पंडित राजकुमार तिवारी ने बताया कि मान्यता के अनुसार राजा जनक की पुत्री माता सीता का प्राकट्य भूमि में हल के स्पर्श से हुआ था। यही कारण है कि इस पावन दिन पर व्रती महिलाएं हल से जुते खेत में नहीं जाती हैं और न ही जोतकर उपजाए गए किसी भी अनाज या फल का सेवन करती हैं। पारणा के दौरान केवल बिना हल चलाए प्राकृतिक रूप से उगने वाले पसहर (पसही) चावल और छह प्रकार की भाजियों का ही भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
व्रती महिलाओं सुनीता साहू, दुलारी ठाकुर, ज्योति सोनी और जयंती साहू ने बताया कि कमरछठ केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संतानों के प्रति मां के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही इस लोक-संस्कृति को निभाते हुए माताओं ने शाम को पसहर चावल का प्रसाद ग्रहण कर अपने निर्जला व्रत का पारणा किया।
