धमतरी। भ्रष्टाचार और कछुआ गति की कार्यप्रणाली मासूम बच्चों के भविष्य पर किस कदर भारी पड़ सकती है, इसका जीता-जागता उदाहरण धमतरी जिले के नगरी विकासखंड अंतर्गत ग्राम बोड़रा में देखने को मिल रहा है। यहाँ सरकार ने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए लगभग 24 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से एक नए शासकीय माध्यमिक शाला भवन का निर्माण कराया था। लेकिन, निर्माण के महज दो साल के भीतर ही यह नया भवन ‘खंडहर’ में तब्दील होने लगा है। तीन कमरों वाले इस स्कूल की दीवारों में न सिर्फ डरावनी और गहरी दरारें पड़ चुकी हैं, बल्कि भवन का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे जमीन में धंसता जा रहा है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि ये दरारें हर बीतते दिन के साथ चौड़ी होती जा रही हैं, जो किसी बड़े हादसे को खुला आमंत्रण दे रही हैं।
इस जानलेवा खतरे के बावजूद विभागीय लाचारी और प्रशासनिक मजबूरी के चलते कक्षा छठवीं से आठवीं तक के 53 छात्र-छात्राएं इसी मौत के साये में बैठकर पढ़ाई करने को विवश हैं। हाल ही में जब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आला अधिकारियों की टीम निरीक्षण करने पहुँची, तो उन्होंने आनन-फानन में दो क्षतिग्रस्त कमरों को असुरक्षित घोषित कर वहाँ बच्चों को न बैठाने की सख्त हिदायत दे दी। मगर स्कूल प्रशासन के सामने अब यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि यदि तीन में से दो कमरों को बंद कर दिया जाए, तो तीन अलग-अलग कक्षाओं के 53 बच्चों को महज एक ही कमरे में एक साथ कैसे पढ़ाया जाए? कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण स्कूल प्रबंधन मजबूरन उन्हीं जर्जर और धंसते कमरों में कक्षाएं संचालित कर रहा है, जहाँ की दीवारें कभी भी जमींदोज हो सकती हैं।
स्कूल के प्रधान पाठक महेंद्र बोरझा ने अपनी लाचारी बयां करते हुए बताया कि उन्होंने इस भयावह स्थिति से विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) को लिखित में अवगत कराया था। इसके बाद शिक्षा विभाग, जनपद और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग (RES) के अधिकारियों ने संयुक्त रूप से मौके पर पहुँचकर जांच की और दो कमरों को पूरी तरह ‘नो-गो ज़ोन’ घोषित कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रशासन ने बच्चों को खतरे से बाहर निकालने के निर्देश तो दे दिए, पर उनके बैठने के लिए कोई दूसरा सुरक्षित ठिकाना मुहैया नहीं कराया।
इधर, ग्रामीणों में इस लापरवाही को लेकर भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि शासन ने तो लाखों रुपये पानी की तरह बहाए थे, लेकिन निर्माण कार्य में जमकर घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया और तकनीकी मापदंडों की धज्जियां उड़ाई गईं। यही वजह है कि गारंटी अवधि पूरी होने से पहले ही इमारत ढहने की कगार पर आ गई है। ग्रामीण अब यह मांग कर रहे हैं कि बच्चों की जान जोखिम में डालने वाले भ्रष्ट ठेकेदार और मूकदर्शक बने जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाए। दूसरी ओर, जब इस संबंध में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग के अनुविभागीय अधिकारी (SDO) चेतन लाल हिरवानी से बात की गई, तो उनका तर्क था कि ठेकेदार के साथ अनुबंध की अवधि में अभी दो साल बचे हैं, इसलिए मरम्मत का काम उसी से कराया जाएगा। उन्होंने अजीबोगरीब आश्वासन देते हुए कहा कि फिलहाल कमरों को खाली रखने को कहा गया है और बारिश का मौसम बीत जाने के बाद इस जर्जर भवन की मरम्मत कराई जाएगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में मानसून खत्म होने का इंतजार कर रहा है?
