जांजगीर-चांपा। बहनीडीह विकासखंड के ग्राम खपरीडीह में सरकारी गौचर भूमि पर कब्जे और रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का बड़ा मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत के सरपंच ने कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन देकर आरोप लगाया है कि खसरा नंबर 282, रकबा 6.35 एकड़ भूमि मिसल रिकॉर्ड में शासकीय गौचर भूमि के रूप में दर्ज है, लेकिन पटवारी और भूमि दलालों की मिलीभगत से इस भूमि के 2.40 एकड़ हिस्से को अलग-अलग लोगों के नाम दर्ज कर दिया गया।आवेदन के अनुसार यह भूमि तहसील कार्यालय, थाना और सिंचाई विभाग के ठीक सामने स्थित है तथा भविष्य में शासकीय कार्यालयों एवं अन्य सरकारी उपयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद कथित रूप से नियमों को ताक पर रखकर भूमि का नामांतरण निजी व्यक्तियों के नाम कर दिया गया।
आवेदन के अनुसार यह भूमि तहसील कार्यालय, थाना और सिंचाई विभाग के ठीक सामने स्थित है तथा भविष्य में शासकीय कार्यालयों एवं अन्य सरकारी उपयोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद कथित रूप से नियमों को ताक पर रखकर भूमि का नामांतरण निजी व्यक्तियों के नाम कर दिया गया।सरपंच ने अपने आवेदन में आनंद, अमित, सुमित, विष्णुप्रसाद, छोटेलाल, शंभूदयाल और गौतम सहित कई लोगों के नाम दर्ज होने का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि यह पूरा मामला पटवारी और भूमि दलालों की सांठगांठ का परिणाम है।
सरपंच ने अपने आवेदन में आनंद, अमित, सुमित, विष्णुप्रसाद, छोटेलाल, शंभूदयाल और गौतम सहित कई लोगों के नाम दर्ज होने का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि यह पूरा मामला पटवारी और भूमि दलालों की सांठगांठ का परिणाम है।
कलेक्टर जनदर्शन में दिए गए आवेदन में मांग की गई है कि मिसल रिकॉर्ड में दर्ज शासकीय गौचर भूमि को पुनः शासन के नाम दर्ज किया जाए तथा 2.40 एकड़ भूमि को तत्काल शासकीय भूमि घोषित कर सुरक्षित किया जाए। आवेदन में यह भी कहा गया है कि यदि भूमि शासन के नाम दर्ज होती है तो भविष्य में यहां सरकारी कार्यालय, शासकीय आवास और अन्य जनहित के निर्माण कार्य किए जा सकते हैं।अब इस पूरे मामले नजर जिला प्रशासन के कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी भूमि पर कब्जे और राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी का बड़ा मामला साबित हो सकता है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकारी जमीन को बचाने में जिम्मेदार राजस्व अमला पूरी तरह विफल रहा, या फिर इस खेल में उसकी भी भूमिका रही?
अब इस पूरे मामले नजर जिला प्रशासन के कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी भूमि पर कब्जे और राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी का बड़ा मामला साबित हो सकता है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकारी जमीन को बचाने में जिम्मेदार राजस्व अमला पूरी तरह विफल रहा, या फिर इस खेल में उसकी भी भूमिका रही?
