पारसनाथ सिंह | सूरजपुर
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर, जहां सत्ता के नुमाइंदों का आशियाना है और जिला प्रशासन का रसूखदार अमला बैठता है, ठीक उसी वीआईपी चौकड़ी की नाक के नीचे विकास की धज्जियां उड़ रही हैं। सूरजपुर-रामनगर मार्ग पर सरस्वतीपुर गांव से गुजरने वाली करीब दो किलोमीटर की सड़क इस वक्त सिस्टम के खोखले दावों का सबसे वीभत्स चेहरा बन चुकी है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के नाम पर करोड़ों बजट वाला विभाग अब गहरी नींद में है और जनता इस नरकनुमा सड़क पर रेंगने को मजबूर है। आलम यह है कि बारिश में यह सड़क कीचड़ और जानलेवा जलभराव का दलदल बन जाती है, और जैसे ही धूप खिलती है, धूल का ऐसा बवंडर उठता है कि स्थानीय लोगों का सांस लेना दूभर हो जाता है। सूरजपुर का यह वो इलाका है जहां ग्रामीण पिछले दो साल से प्रशासन के निकम्मेपन का दंश झेल रहे हैं।
विडंबना देखिए कि जिस कलेक्ट्रेट में बैठकर जिले की किस्मत लिखने के दावे किए जाते हैं, और जिस विधायक निवास से विकास की गंगा बहाने के चुनावी वादे फूटते हैं, वहां से चंद कदमों की दूरी पर स्थित सरस्वतीपुर का प्राइमरी स्कूल है। नौनिहाल बच्चे हर रोज इसी तबाही के रास्ते से होकर स्कूल जाने को अभिशप्त हैं। यह सड़क कोई आम ग्रामीण पगडंडी नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की लाइफलाइन है, जिससे रोजाना सैकड़ों छात्र, कॉलेज के युवा, दिहाड़ी मजदूर और दफ्तरों में कलम घिसने वाले कर्मचारी गुजरते हैं। लेकिन इस बदहाल पगडंडी पर आए दिन फिसलकर चोटिल होते मासूम बच्चे और हिचकोले खाती जिंदगी प्रशासन की चमड़ी पर कोई असर नहीं डाल पा रही है। सबसे खौफनाक मंजर तब होता है जब किसी गंभीर मरीज को लेकर एम्बुलेंस इस रास्ते पर दम तोड़ने लगती है। गड्ढों और कीचड़ के साम्राज्य में एम्बुलेंस की रफ्तार क्या थमती है, मानों मरीज की सांसें ही अटक जाती हैं।

जनता की सुरक्षा और उनके जीवन से हो रहे इस खिलवाड़ पर क्षेत्र के विधायक भूलन सिंह मराबी और प्रशासनिक अमले ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है। चुनाव के वक्त जनता के पैरों में गिरकर विकास की कसमें खाने वाले नेता आज गायब हैं। जिला प्रशासन की नाकामी और सुस्ती की गवाही यह सड़क खुद दे रही है, जहां भारी वाहनों के प्रवेश निषेध का एक खोखला बोर्ड तो टांग दिया गया है, लेकिन अफसरों की सांठगांठ के चलते धड़ल्ले से भारी ट्रक इस मार्ग को रौंद रहे हैं। नियम-कानूनों को ठेंगे पर रखकर दौड़ते इन ट्रकों ने प्रधानमंत्री सड़क की खाल उधेड़ कर रख दी है।
अधिकारियों और रसूखदार नेताओं को जनता का यह दर्द कभी समझ नहीं आएगा, क्योंकि वे बंद कांच वाली, चमचमाती एसी गाड़ियों में बैठकर इस तबाही के बगल से सनसनाते हुए निकल जाते हैं। धूल का गुबार और कीचड़ के छींटे तो सिर्फ उस आम आदमी के हिस्से आते हैं जो साइकिल और मोटरसाइकिल पर अपनी रोजी-रोटी कमाने निकलता है। स्थानीय ग्रामीणों ने अब सीधे कलेक्टर से गुहार लगाते हुए इस ढाई किलोमीटर की सड़क के पूर्ण पुनर्निर्माण की मांग की है। लोगों का साफ कहना है कि अगर प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागा, तो यहां किसी बड़े और आत्मघाती हादसे की जिम्मेदारी सीधे सरकार और जिला प्रशासन की होगी। देखना यह है कि बंद कमरों में कागजी घोड़े दौड़ाने वाला अमला धरातल पर उतरकर कोई ठोस कदम उठाता है, या फिर जनता को यूं ही तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता है।
