बलरामपुर। प्रशासनिक संवेदनहीनता और दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार बलरामपुर जिले के प्रभावित किसानों के सब्र का बांध टूट गया है। वाड्रफनगर विकासखंड के अंतर्गत छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाले धनवार अंतरराज्यीय नाके पर आज सुबह से ही प्रभावित ग्रामीण अनिश्चितकालीन धरने और चक्का जाम पर बैठ गए हैं। वर्ष 2005-06 में धनवार में आरटीओ (RTO) चेक पोस्ट और परिसर निर्माण के लिए प्रशासन द्वारा 19 आदिवासी और किसान परिवारों की करीब 20 एकड़ उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण किया गया था। इस अधिग्रहण को पूरे 20 साल बीत चुके हैं, लेकिन व्यवस्था के दांव-पेचों के कारण इन शोषित परिवारों को आज तक मुआवजे का एक रुपया भी नसीब नहीं हुआ है। अपनी ही जमीन के हक के लिए दर-दर भटकने के बाद अब ग्रामीणों ने आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है, जिससे दोनों राज्यों के बीच की जीवन रेखा कही जाने वाली इस सड़क पर आवागमन पूरी तरह ठप होने की कगार पर है।
मौके की नजाकत और चक्का जाम की पूर्व चेतावनी को देखते हुए धनवार बॉर्डर पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। प्रभावित ग्रामीणों ने इस आंदोलन की शुरुआत करने से पहले कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक बलरामपुर को बकायदा एक ज्ञापन सौंपकर अपनी माँगें स्पष्ट कर दी थीं। ग्रामीणों का दो टूक कहना है कि या तो शासन उन्हें ‘भूमि के बदले भूमि’ आवंटित करे, या फिर वर्तमान स्थिति को देखते हुए ’40 लाख रुपये प्रति एकड़’ की दर से उचित मुआवजे का भुगतान तत्काल किया जाए। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि इस चक्का जाम के कारण आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होती है या क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल उस सुस्त प्रशासनिक तंत्र की होगी जो बीस वर्षों से इस गंभीर मुद्दे पर कुंभकर्णी नींद सो रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रभावित ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने स्थानीय विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते को अपनी इस विकट समस्या से कई बार अवगत कराया और गुहार लगाई, लेकिन उनके स्तर पर केवल आश्वासन और उदासीनता ही हाथ लगी। चुनाव के समय किसानों के द्वार पर बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधियों द्वारा दो दशकों से न्याय की आस लगाए बैठे इन परिवारों के दर्द की अनदेखी करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। न तो इस मुद्दे को विधानसभा में पुरजोर तरीके से उठाया गया और न ही शासन स्तर पर इसकी कोई ठोस पैरवी की गई। अपनी सुलगती मांगों को लेकर धरने पर अड़े ग्रामीणों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, यह आंदोलन और चक्का जाम समाप्त नहीं होगा। अब देखना यह है कि इस व्यापक जन-आक्रोश के बाद भी सोशित परिवारों को उनका हक मिलता है या प्रशासन का मौन आगे भी बरकरार रहता है।
