अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर से सटे रनपुर गांव में सदियों से खुले आसमान के नीचे पूजी जा रहीं लोकदेवी नाथल दाई के स्थल पर अब भव्य मंदिर और कॉरिडोर निर्माण की प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं। राज्य शासन द्वारा इस कार्य के लिए 5 लाख रुपये की स्वीकृति मिलने के बाद विधिवत भूमिपूजन संपन्न कराया जा चुका है, लेकिन इस निर्माण प्रक्रिया के साथ ही वर्षों पुराने इस परिसर को लेकर विवाद अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। रनपुर, जिसे हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के प्रतीक स्थल के रूप में देखा जाता रहा है क्योंकि नाथल दाई का यह पवित्र चबूतरा परिसर में स्थित एक मजार से सटा हुआ है, आज आस्था, प्रशासनिक रिकॉर्ड और कानूनी दावों के जटिल चौराहे पर खड़ा है।
विवाद की शुरुआत मंदिर निर्माण के प्रस्ताव के खिलाफ अदालत में दायर आपत्तियों के बाद हुई। स्थानीय हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया है कि मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को रोकने के लिए कानूनी अड़चनें पैदा की जा रही हैं, जिसके जवाब में वे भी न्यायालय में मजबूत पैरवी करने की तैयारी में हैं। इसी के समानांतर, परिसर में मौजूद मजार के ऐतिहासिक वजूद को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। संगठनों का दावा है कि पूर्व में यहां विशेष रूप से संरक्षित ‘पहाड़ी कोरवा’ जनजाति के एक व्यक्ति को दफनाया गया था, जिसे समय के साथ मजार का रूप दे दिया गया। इस दावे के समर्थन में कुछ पक्षों ने मामले की प्रशासनिक जांच और दफन अवशेषों के डीएनए परीक्षण तक की मांग उठाई है, हालांकि इन दावों की किसी आधिकारिक या पुरातात्विक स्रोत से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
नवरात्रि के दौरान पहली बार दुर्गा प्रतिमा की स्थापना से लेकर अब कॉरिडोर विस्तार की योजनाओं तक, रनपुर का यह धार्मिक केंद्र अचानक व्यापक चर्चा और संवेदनशीलता के केंद्र में आ गया है। प्रशासनिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पड़ताल तथा दोनों पक्षों की विधिक दलीलों के बीच यह मामला अब अदालती प्रक्रिया के अधीन है। दोनों समुदायों की साझा विरासत और आस्था के इस संवेदनशील मोड़ पर अब पूरे क्षेत्र की निगाहें न्यायालयीन फैसले और स्थानीय प्रशासन के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों पर टिकी हैं।
