जांजगीर-चांपा। जिले की शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए कलेक्टर जन्मेजय महोबे ने ज्ञानदीप और शिक्षा दूत से पुरस्कृत शिक्षकों के साथ बैठक की। स्मार्ट क्लास से लेकर किचन गार्डन, कमजोर विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान और बेहतर परीक्षा परिणाम सहित कई मुद्दों पर मंथन हुआ। शिक्षकों के नवाचारों की तारीफ भी हुई और उन्हें सम्मानित भी किया गया। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि बैठकों, कार्यशालाओं और सम्मान समारोहों के बाद जिले के सरकारी स्कूलों की वास्तविक तस्वीर कितनी बदलेगी?
कलेक्टर ने खुद स्पष्ट कहा कि स्कूलों में किए जा रहे अच्छे कार्य केवल योजनाओं और चर्चाओं तक सीमित न रहें, बल्कि उनका असर धरातल पर दिखाई देना चाहिए। यही बात अब जिला शिक्षा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गई है। यदि जमीनी स्तर पर सब कुछ बेहतर है तो फिर कमजोर विद्यार्थियों, परीक्षा परिणाम और स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए बार-बार नई कार्ययोजनाओं की जरूरत क्यों पड़ रही है?
कार्यक्रम में स्मार्ट क्लास, पुस्तकालय, शाला विकास और विभिन्न गतिविधियों के उदाहरण गिनाए गए, लेकिन कुछ चुनिंदा स्कूलों के नवाचारों से पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर नहीं बदली जा सकती। असली चुनौती उन स्कूलों की है जहां पढ़ाई की गुणवत्ता, विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति और कमजोर बच्चों की शैक्षणिक स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
कलेक्टर ने जिला परीक्षा समिति को बेहतर परिणाम के लिए कार्ययोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के निर्देश दिए हैं। अब सवाल निर्देशों का नहीं, नतीजों का है। हर साल योजनाएं बनती हैं, बैठकें होती हैं और लक्ष्य तय होते हैं, लेकिन परीक्षा परिणाम सामने आने के बाद ही पता चलता है कि कागज की कार्ययोजना कितनी जमीन पर उतरी।
सम्मान से नहीं, परिणाम से सुधरेगी शिक्षा
पुरस्कृत शिक्षकों को सम्मानित करना निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाने वाला कदम है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र से नहीं, बच्चों के सीखने और परीक्षा परिणाम से होना चाहिए। जिला प्रशासन ने अब नवाचारों को सोशल मीडिया पर साझा करने और किचन गार्डन विकसित करने के निर्देश भी दिए हैं। सवाल यह है कि इन गतिविधियों के साथ पढ़ाई की मूल गुणवत्ता की नियमित निगरानी कौन करेगा?
अब जिले के अभिभावकों और विद्यार्थियों की नजर इस बात पर है कि बैठक में दिए गए निर्देश फाइलों और फोटो तक सीमित रहते हैं या वास्तव में स्कूलों की कक्षाओं तक पहुंचते हैं। आने वाले परीक्षा परिणाम ही तय करेंगे कि शिक्षा सुधार की यह कवायद जमीन पर सफल हुई या एक और सरकारी बैठक बनकर रह गई।
