जांजगीर-चांपा। जिला कार्यालय में इन दिनों बैठकों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। कलेक्टर रोजाना दो से तीन बैठकें लेकर अधिकारियों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं। शहर की समस्याओं, सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कामकाज पर चर्चा भी हो रही है, लेकिन बैठकों के बावजूद जमीनी तस्वीर बदलती नजर नहीं आ रही।
बैठक का उद्देश्य व्यवस्था में कसावट लाना और सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचाना है। लेकिन शहर की सफाई, यातायात, अतिक्रमण और दूसरी स्थानीय समस्याएं अब भी सवाल बनी हुई हैं। ऐसे में लगातार होने वाली बैठकों की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है।
घंटों की बैठकों के बाद भी यदि परिणाम जमीन पर दिखाई न दें तो सवाल बैठक की संख्या पर नहीं, उसकी प्रभावशीलता पर उठता है। निर्देश जारी करना आसान है, लेकिन उनकी निगरानी और अमल ही प्रशासन की असली परीक्षा है।
इधर, अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भी बैठकों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह है कि बैठक में तय होने वाले फैसलों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय है या नहीं।
जनता को बैठकों का आंकड़ा नहीं, व्यवस्था में बदलाव और काम का नतीजा चाहिए। अब जिला प्रशासन को यह साबित करना होगा कि बैठकों की यह लंबी कवायद सिर्फ कागजों और चर्चाओं तक सीमित नहीं, बल्कि उसका असर वास्तव में जमीन पर भी दिखाई देता है।
