बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दिव्यांग अधिकारों के संरक्षण को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो प्रशासनिक मनमानी पर न्याय की बड़ी जीत है। अदालत ने सेवा दे रहे दो दृष्टिबाधित व्यायाम शिक्षकों (पीटीआई) के खिलाफ सरकार द्वारा की गई दंडात्मक कार्रवाई को पूरी तरह खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए न सिर्फ एक महिला शिक्षक की बर्खास्तगी को अवैध घोषित कर तुरंत बहाल करने का आदेश दिया, बल्कि एक अन्य शिक्षक को जारी कारण बताओ नोटिस को भी निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपने तल्ख रुख में साफ कहा कि पूरी भर्ती प्रक्रिया संपन्न होने और कर्मचारियों के सेवा में आने के बाद, सरकार किसी प्रशासनिक कमेटी की रिपोर्ट का बहाना बनाकर नियमों में मनमाना बदलाव नहीं कर सकती। अपनी ही गलतियों का ठीकरा उन कर्मचारियों पर नहीं फोड़ा जा सकता, जिन्होंने विभाग से कोई भी जानकारी नहीं छुपाई थी।
इस कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2019 में हुई थी, जब संचालनालय लोक शिक्षण रायपुर ने शिक्षकों के विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला था। नियमानुसार इसमें दिव्यांगों के लिए आरक्षण का प्रावधान तो था, लेकिन यह कहीं स्पष्ट नहीं था कि कौन सी श्रेणी के दिव्यांग इस पद के लिए अपात्र होंगे। इसी प्रक्रिया के तहत 40 फीसदी दृष्टिबाधित शिव शंकर साहू और नील कुमारी ने शारीरिक शिक्षा शिक्षक पद के लिए आवेदन किया और पूरी ईमानदारी से चयन प्रक्रिया व दस्तावेज़ सत्यापन के दौर को पार कर 24 अगस्त 2021 को नियुक्ति पाई। सब कुछ ठीक चल रहा था और दोनों अपनी सेवाएं दे रहे थे, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद जनवरी 2023 में संयुक्त संचालक (शिक्षा) बिलासपुर ने उन्हें एक नोटिस थमाकर चौंका दिया। इस नोटिस में एक आंतरिक कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि पीटीआई पद के लिए केवल एक हाथ से प्रभावित या कम सुनने वाले दिव्यांग ही योग्य हैं। इसी भेदभावपूर्ण आधार पर शिव शंकर साहू को सेवा समाप्ति का नोटिस मिला और नील कुमारी को 6 फरवरी 2023 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, जिसके खिलाफ दोनों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय के पुराने निर्णयों और ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016’ का कड़ा हवाला देते हुए सरकार के इस रवैये को आड़े हाथों लिया। अदालत ने याद दिलाया कि हमारा संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देने की वकालत करता है और सामान्य प्रशासन विभाग के 2014 के सर्कुलर के मुताबिक, विभाग दिव्यांगों के अवसरों को बढ़ा तो सकते हैं लेकिन पहले से तय पदों को कम नहीं कर सकते। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब शिव शंकर साहू सम्मानपूर्वक अपने पद पर बने रहेंगे, वहीं कोर्ट ने शिक्षा विभाग को कड़ा निर्देश दिया है कि नील कुमारी को 30 दिनों के भीतर सेवा में वापस लिया जाए। इतना ही नहीं, विभाग को उन्हें बर्खास्तगी की तारीख से लेकर बहाली तक का पूरा पिछला वेतन, भत्ते और वरिष्ठता का पूरा लाभ अनिवार्य रूप से देना होगा।
