नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल की शक्तियों का इस्तेमाल करके बनाई गई सजा में छूट (रिमिशन) की नीति को, बाद में सरकार द्वारा बनाई गई किसी वैधानिक नीति से खत्म नहीं किया जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने बुधवार को यह ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए कहा कि राज्य सरकारें बाद की किसी नीति का हवाला देकर, कैदियों को पहले से मिल रहे अधिक लाभकारी संवैधानिक रिमिशन के लाभ से वंचित नहीं कर सकती हैं।
यह मामला हरियाणा के एक उम्रकैद के कैदी की याचिका पर आया, जिसकी समय से पहले रिहाई की अर्जी राज्य सरकार ने खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता को साल 2019 में एक 12 वर्षीय बच्चे की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसने 14 साल से अधिक की वास्तविक जेल अवधि पूरी करने के बाद वर्ष 2002 की उदार नीति के तहत रिहाई की मांग की थी। हालांकि, हरियाणा सरकार और बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी थी कि अपराध के समय साल 2008 की कड़ी नीति लागू थी, जिसके तहत उसे कम से कम 20 साल की वास्तविक कैद काटनी होगी।
इस कानूनी टकराव को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2002 की नीति सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के आदेश से संचालित थी, जो कि एक स्वतंत्र संवैधानिक शक्ति है। इसके विपरीत, सरकार की साल 2008 की नीति CrPC की धाराओं 432 और 433 के तहत बनी एक वैधानिक प्रक्रिया थी, जिसमें केवल मुख्यमंत्री की मंजूरी का प्रावधान था। अदालत ने रेखांकित किया कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति के तहत कैदी को मिलने वाला अधिकार किसी भी प्रशासनिक या विधायी नीति से ऊपर है।
शीर्ष अदालत ने कैदी की अपील को स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया है कि वह वर्ष 2002 की नीति के मानदंडों के अनुसार चार हफ्ते के भीतर उसकी रिहाई की अर्जी पर नए सिरे से विचार करे। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था भविष्य के मामलों पर लागू होगी और पहले से तय हो चुके रिमिशन के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। इस फैसले के बाद अब राज्यों में राज्यपाल की नीतियां प्रभावी रूप से मजबूत होंगी और सरकारों की मनमानी पर रोक लगेगी।
