अम्बिकापुर। सरगुजा जिले के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन और उसके पर्यावरण पर पड़ते प्रभावों को लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के एक बड़े बयान ने राज्य में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को फिर से गरमा दिया है। सरगुजा के रामगढ़ महोत्सव के समापन अवसर पर पहुंचे मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि लोगों को अपने मन से यह भ्रम पूरी तरह दूर कर देना चाहिए कि खनन या उद्योगों से केवल पर्यावरण को नुकसान ही हो रहा है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के समृद्ध भूगोल का हवाला देते हुए याद दिलाया कि राज्य का 44 प्रतिशत भू-भाग आज भी वनों से ढका हुआ है, जो हमारी अटूट प्राकृतिक संपदा का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने सरकार की पर्यावरण नीतियों का बचाव करते हुए कहा कि राज्य में वर्षों से कैम्पा (CAMPA) योजना के तहत वन विभाग बड़े पैमाने पर लगातार वृक्षारोपण कर रहा है। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर शुरू हुए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान और कैम्पा के संयुक्त प्रयासों से राज्य का 2.5 प्रतिशत अतिरिक्त क्षेत्र हरियाली से कवर किया जा चुका है।
उद्योग नीति का स्पष्ट उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई उद्योगपति काम के लिए पेड़ काटता है, तो नियमों के तहत उसे बदले में उससे कहीं ज़्यादा पौधे रोपने होते हैं। विकास की अनिवार्यता को रेखांकित करने के लिए उन्होंने नेशनल हाईवे-43 के चौड़ीकरण का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार पेड़ काटना मजबूरी बन जाता है, क्योंकि सड़कें आसमान में नहीं बनाई जा सकतीं। उन्होंने इस मामले पर राजनीति करने वालों को नसीहत दी कि आरोप लगाने से पहले वे राज्य की उद्योग नीति और विकास की जमीनी आवश्यकताओं को अच्छी तरह समझ लें।
मुख्यमंत्री के इस दावे के उलट, हसदेव अरण्य क्षेत्र के जागरूक ग्रामीणों और आदिवासियों की चिंताएं और आक्रोश कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। क्षेत्र के लोगों ने खनन कंपनी अदानी द्वारा किए जा रहे वृक्षारोपण के दावों को पूरी तरह खोखला और झूठा करार दिया है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि कंपनी द्वारा लगाए जा रहे पेड़ पूरी तरह अनुपयोगी हैं और वे कभी भी एक प्राकृतिक, घने जंगल का विकल्प या रूप नहीं ले सकते। इस समय क्षेत्र के निवासियों को सबसे बड़ी चिंता केते एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक के खुलने को लेकर खाए जा रही है।
ग्रामीणों का मानना है कि यदि यह नया ब्लॉक खुला, तो हसदेव के फेफड़े कहे जाने वाले लाखों पेड़ जमींदोज हो जाएंगे, जिससे उनका सदियों पुराना जल, जंगल और जमीन से नाता हमेशा के लिए टूट जाएगा। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि इस अंधाधुंध कटाई से क्षेत्र की कई जीवनदायिनी नदियां और बरसाती नाले हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे। इसके अलावा, आदिवासियों के लिए यह लड़ाई सिर्फ पेड़ों की नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की है; क्योंकि हसदेव का यह अरण्य क्षेत्र उनकी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक धरोहरों को अपने भीतर समेटे हुए है, जिस पर अब सीधे तौर पर विनाश का खतरा मंडरा रहा है।
