लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सांगठनिक ढांचे में व्यापक बदलाव किया है। नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही बीजेपी ने एक ऐसे चेहरे को अपने पाले में शामिल कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है, जिसका अतीत संघर्ष और बगावत की बड़ी कहानी बयां करता है। समाजवादी पार्टी की बागी नेता पूजा पाल को उत्तर प्रदेश बीजेपी का नया उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। कभी सपा की कद्दावर नेता रहीं पूजा पाल की यह नई राजनीतिक पारी प्रदेश के सियासी समीकरणों को बदलने वाली मानी जा रही है।
दरअसल, पूजा पाल को पिछले साल ही समाजवादी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके पीछे मुख्य वजह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करना और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होना बताया गया था। कौशाम्बी जिले की चैल सीट से विधायक रहीं पूजा पाल ने विधानसभा में मुख्यमंत्री की ‘जीरो-टॉलरेंस’ नीति की सार्वजनिक सराहना की थी, जिसके तुरंत बाद अखिलेश यादव के हस्ताक्षर वाले पत्र के जरिए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।
पूजा पाल का यह राजनीतिक यू-टर्न और बीजेपी में इतना बड़ा पद मिलना, उनके उस लंबे संघर्ष का नतीजा है जो उन्होंने प्रयागराज के कुख्यात माफिया अतीक अहमद के खिलाफ लड़ा था। साल 2005 में बहुजन समाज पार्टी के तत्कालीन विधायक राजू पाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिसका आरोप अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ पर लगा था। यह त्रासदी कितनी बड़ी थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजू पाल की हत्या उनकी और पूजा पाल की शादी के महज नौ दिन बाद ही कर दी गई थी।
पति के न्याय के लिए पूजा पाल ने सालों तक कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ी। जब योगी सरकार ने अतीक अहमद के माफिया साम्राज्य पर बुलडोजर चलाया और सख्त कार्रवाई की, तो पूजा पाल खुद को मुख्यमंत्री का आभार जताने से नहीं रोक पाईं। उन्होंने सदन में भावुक होते हुए कहा था कि जिस इंसाफ के लिए वह सालों से भटक रही थीं और किसी ने उनकी सुध नहीं ली, वह इंसाफ उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों ने दिलाया है। यही तारीफ सपा नेतृत्व को नागवार गुजरी और उनकी बगावत का रास्ता साफ हो गया।
राजू पाल की हत्या के बाद पूजा पाल का राजनीतिक सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। बसपा ने उन्हें सबसे पहले इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर हुए उपचुनाव में अतीक के भाई अशरफ के खिलाफ मैदान में उतारा था, हालांकि उस वक्त उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और साल 2007 तथा 2012 के विधानसभा चुनावों में इसी सीट से लगातार जीत दर्ज कर विधानसभा पहुँचीं। मायावती की पार्टी बसपा में उनका सफर तब थमा, जब साल 2018 में बीजेपी नेता और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से उनकी मुलाकात की खबरें आईं, जिसके बाद बसपा ने उन्हें निष्कासित कर दिया।
इसके बाद 2019 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा और 2022 में चैल सीट से विधायक चुनी गईं। अब सपा से निष्कासन और सीएम योगी से मुलाकातों के दौर के बाद, बीजेपी ने उन्हें सीधे प्रदेश उपाध्यक्ष की कमान सौंपकर न सिर्फ उनके सियासी कद को बढ़ाया है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए अपने पिछड़े वर्ग के समीकरणों को भी और मजबूत कर लिया है।
