अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा से आई एक तस्वीर ने सूबे के आदिवासी विकास विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। व्यवस्था की बेरुखी और बदइंतजामी से तंग आकर घंघरी स्थित ‘प्रयास आवासीय विद्यालय’ के सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतर आए। अपने हाथों में कॉपियां और आंखों में आक्रोश लिए ये नौनिहाल कड़कड़ाती धूप में करीब 10 किलोमीटर का सफर पैदल तय कर सीधे कलेक्टर दफ्तर जा पहुंचे। छात्रों का यह पैदल मार्च किसी उत्सव के लिए नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ था जो उनके भविष्य को अंधकार में धकेल रहा है। कलेक्ट्रेट परिसर में जब इन आदिवासी छात्रों का गुस्सा फूटा, तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया। छात्रों ने दो टूक शब्दों में स्कूल प्रबंधन और विभागीय अफसरों पर करियर के साथ खिलवाड़ करने का गंभीर आरोप लगाया है।
छात्रों की सबसे बड़ी चिंता उनकी पढ़ाई को लेकर है। देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के नाम पर खोले गए इस ‘प्रयास’ स्कूल में कोचिंग के लिए जरूरी शिक्षक ही गायब हैं। छात्रों का आरोप है कि शिक्षकों की भारी कमी के कारण उनकी पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। बात सिर्फ पढ़ाई तक ही सीमित नहीं है; स्कूल की रसोई से जो कड़वा सच निकलकर सामने आया है, वह हैरान करने वाला है। छात्रों ने रोष जताते हुए कहा कि जब भी कोई बड़ा अधिकारी निरीक्षण के लिए आता है, तो रातों-रात मेन्यू बदल जाता है और थाली में छप्पन भोग सज जाते हैं। लेकिन जैसे ही साहब की गाड़ी कलेक्ट्रेट के लिए मुड़ती है, छात्रों की किस्मत में फिर से वही कीड़े लगे चावल और घटिया दर्जे का बेस्वाद भोजन परोस दिया जाता है। अफसरों का यह ‘औपचारिक दौरा’ छात्रों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा साबित हो रहा है।
इस पूरे घालमेल में भ्रष्टाचार की बू भी साफ आ रही है। छात्रों ने खुलकर बताया कि बाल कटिंग (हेयरकट) जैसी बुनियादी सुविधाओं के नाम पर भी ठेकेदार और प्रबंधन मिलकर बंदरबांट कर रहे हैं। छात्रों के बाल महीनों तक नहीं काटे जाते, लेकिन कागजों पर ठेकेदारों को नियमित भुगतान हो रहा है। जब छात्रों ने विभागीय अधिकारियों के सामने ही पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया, तो अफसरों के पास बगलें झांकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। मामले की गंभीरता और मीडिया के कैमरों को देखते हुए आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त ललित शुक्ला ने आनन-फानन में मोर्चा संभाला। उन्होंने छात्रों को शांत कराते हुए जांच और कड़ी कार्रवाई का भरोसा तो दिया है, लेकिन सवाल वही है कि यह आश्वासन हकीकत में कब बदलेगा? फिलहाल, इस बड़े बवाल ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है, और अब देखना यह होगा कि कलेक्ट्रेट की चौखट तक पहुंचे इन बच्चों को उनका हक कब तक मिलता है।
