नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज यानी 20 जून 2026 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर का दौरा सिर्फ विकास परियोजनाओं की सौगात तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे इतिहास का एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक पन्ना छिपा है। प्रधानमंत्री यहाँ आयोजित ‘पश्चिम बंग दिवस समारोह’ में शामिल होने जा रहे हैं और यह तारीख बंगाल के अस्तित्व, उसकी पहचान और भारतीय गणराज्य में उसके बने रहने की ऐतिहासिक गाथा से जुड़ी है। भारतीय जनता पार्टी जहाँ इस दिन को बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता और संरक्षण के प्रतीक के रूप में देखती है, वहीं विपक्षी दल इसे देश के विभाजन की एक दर्दनाक याद मानते हैं। यही कारण है कि आज करीब 78 साल बाद भी 20 जून की यह तारीख बंगाल की राजनीति और गलियारों में चर्चा और बहस का एक बड़ा केंद्र बनी हुई है।
इस तारीख की गहराई को समझने के लिए हमें साल 1947 के उस दौर में जाना होगा, जब ब्रिटिश भारत को आज़ाद करने और उसके बंटवारे की रूपरेखा तैयार की जा रही थी। लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के तहत तत्कालीन संयुक्त बंगाल प्रांत के भविष्य का फैसला होना बाकी था। उस समय बंगाल की आबादी वैचारिक और धार्मिक आधार पर दो हिस्सों में बंटी हुई थी। मुस्लिम बहुल पूर्वी हिस्सा नए बनने वाले देश पाकिस्तान के साथ जाने का इच्छुक था, जबकि हिंदू बहुल पश्चिमी हिस्सा हर हाल में भारत का अभिन्न अंग बने रहना चाहता था। इसी असमंजस को दूर करने के लिए 20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा की एक विशेष बैठक बुलाई गई, जिसमें तीन अलग-अलग चरणों में मतदान कराया गया।
इस ऐतिहासिक बैठक के पहले चरण में संयुक्त सत्र के दौरान अविभाजित बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने के प्रस्ताव को 126 के मुकाबले 90 वोटों से खारिज कर दिया गया। इसके बाद दूसरे दौर की वोटिंग केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के विधायकों के बीच हुई, जिसमें उन्होंने 106 बनाम 35 के भारी बहुमत से अविभाजित बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने के पक्ष में मतदान किया। सबसे निर्णायक मोड़ तीसरे चरण की वोटिंग में आया, जो गैर-मुस्लिम यानी हिंदू बहुल क्षेत्रों के सदस्यों के लिए आरक्षित थी। इन विधायकों ने 58 के मुकाबले 21 वोटों से बंगाल के विभाजन और ‘पश्चिम बंगाल’ को भारत के साथ रखने के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
विधानसभा के इसी फैसले ने अंततः तय किया कि 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के साथ ही बंगाल दो टुकड़ों में बंट जाएगा। राज्य का पूर्वी हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान बना, जो आगे चलकर 1971 के युद्ध के बाद स्वतंत्र देश ‘बांग्लादेश’ के रूप में उभरा, जबकि पश्चिमी हिस्सा भारत का हिस्सा बना रहा। बंगाल को भारत में बनाए रखने के इस भगीरथ प्रयास के पीछे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सबसे अहम भूमिका रही, जिन्होंने हिंदू बहुल क्षेत्रों के अस्तित्व की जोरदार वकालत की और जनमानस को इसके महत्व के प्रति जागरूक किया। हालांकि, इस फैसले के तुरंत बाद दोनों ओर भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ और लाखों लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। विभाजन का यह घाव आज भी बंगाल के इतिहास में एक टीस की तरह मौजूद है।
वर्तमान समय में इस तारीख को लेकर राजनीतिक घमासान और तेज हो गया है, क्योंकि सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर ‘पश्चिम बंग दिवस’ घोषित कर दिया है, जिसके तहत राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति इस आयोजन को राष्ट्रीय फलक पर ले आती है, जहाँ वे कृषि, रेलवे, मत्स्य पालन और पीएम-किसान किस्त जैसी कई महत्वपूर्ण विकास योजनाओं का उद्घाटन भी करेंगे। इसके विपरीत, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और कई अन्य दल इस दिन को उत्सव के रूप में मनाने का विरोध करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह तारीख दंगे और विस्थापन की त्रासदी की याद दिलाती है। बंगाली नववर्ष यानी ‘पोइला बैशाख’ को राज्य दिवस घोषित करने की मांग करने वाली ममता बनर्जी सरकार और विपक्ष के इन वैचारिक मतभेदों के बीच, पीएम मोदी का यह दौरा एक बड़ा संदेश देता है कि देश अपनी आज़ादी और अस्तित्व के संघर्ष को कभी न भूले।
