जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की अनूठी जनजातीय संस्कृति आज पर्यावरण संरक्षण की दुनिया में एक मिसाल बनकर उभर रही है। संभाग में मौजूद 8 हजार से अधिक ‘देवगुड़ियां’ आज बस्तर के लिए एक विशाल ‘ऑक्सीजन जोन’ की तरह काम कर रही हैं। घने जंगलों के बीच स्थित ये देवगुड़ियां महज पारंपरिक पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि ये सदियों से सहेजे गए वे संरक्षित वन क्षेत्र हैं, जिन्होंने आधुनिकता के दौर में भी प्रकृति को जीवंत रखा है। बस्तर का आदिवासी समाज आदि काल से ही जल, जंगल और जमीन को अपनी आस्था और जीवन का मूल आधार मानता आया है, यही कारण है कि इन देवगुड़ियों का सामाजिक और धार्मिक महत्व बहुत गहरा है।इन पवित्र देवस्थलों के प्रति स्थानीय समुदायों में इस कदर अगाध श्रद्धा है कि यहाँ की सीमाओं के भीतर पेड़ काटने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कड़े नियमों और लोक-मान्यताओं के चलते, इन क्षेत्रों में हरा पेड़ काटना तो दूर की बात है, ज़मीन पर टूटकर गिरी सूखी लकड़ी या डंठल को भी कोई बिना सामूहिक अनुमति के छूने का साहस नहीं करता। प्रकृति को नुकसान पहुँचाना यहाँ देवताओं के अपमान के समान माना जाता है, और यही सामूहिक अनुशासन इन वनों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन चुका है।
इन पवित्र देवस्थलों के प्रति स्थानीय समुदायों में इस कदर अगाध श्रद्धा है कि यहाँ की सीमाओं के भीतर पेड़ काटने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कड़े नियमों और लोक-मान्यताओं के चलते, इन क्षेत्रों में हरा पेड़ काटना तो दूर की बात है, ज़मीन पर टूटकर गिरी सूखी लकड़ी या डंठल को भी कोई बिना सामूहिक अनुमति के छूने का साहस नहीं करता। प्रकृति को नुकसान पहुँचाना यहाँ देवताओं के अपमान के समान माना जाता है, और यही सामूहिक अनुशासन इन वनों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन चुका है।
बदलते मौसम और वैश्विक पर्यावरण संकट के इस दौर में आदिवासियों की यह जीवनशैली दुनिया को एक नया रास्ता दिखाती है। इस संबंध में घुरवा समाज के महासचिव गंगाराम कश्यप ‘घुर’ का कहना है कि बस्तर के आदिवासियों की परंपराएं शुद्ध रूप से पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल हैं। यहाँ की जनजातियाँ मूलतः प्रकृति-पूजक हैं, जो हर पेड़-पौधे में अपने देवी-देवताओं का वास देखती हैं। यही वजह है कि नई पीढ़ी को भी विरासत में पेड़-पौधों की रक्षा और उनके संवर्धन का संस्कार बचपन से ही मिल जाता है।
प्रकृति के साथ इसी अटूट संतुलन को बनाए रखने के लिए बस्तर में कई विशिष्ट पर्व मनाए जाते हैं। यहाँ ‘पेन-पुंगार’ यानी फूल और प्रकृति की पूजा की जाती है, तो वहीं मानसून के दस्तक देने से ठीक पहले ‘माटी तिहार’ का आयोजन होता है, जिसमें धरती माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। सरल और स्वाभिमानी स्वभाव के धनी बस्तर के आदिवासियों का यह पारंपरिक ज्ञान और जंगल को सहेजने का अनूठा तरीका आज के आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा सबक है, जो यह सिखाता है कि विकास की दौड़ में प्रकृति को पीछे छोड़े बिना भी जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है।
