जांजगीर-चांपा। जिले के अकलतरा विकासखंड से पर्यावरणीय नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। ग्राम तरौद, किरारी और लटिया समेत आसपास के इलाकों में स्थित चूना पत्थर की खुली खदानों में नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर औद्योगिक राखड़ (फ्लाई ऐश) डंप की जा रही है। इस कथित लापरवाही ने न केवल छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल, बल्कि खनिज विभाग और खान सुरक्षा महानिदेशालय (DGMS) की कार्यप्रणाली को भी गंभीर कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का सीधा आरोप है कि ‘अर्थ मूवर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ जैसी कई निजी कंपनियां अपनी लागत घटाने और मुनाफा कमाने के चक्कर में हजारों टन औद्योगिक कचरे को सीधे पानी में बहा रही हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू यह है कि जिन खदानों में मानसून और प्राकृतिक स्रोतों का पानी भरा हुआ है, उन्हीं जलभराव वाले क्षेत्रों में सीधे इस जहरीली राखड़ को खपाया जा रहा है।
यह पूरी कवायद पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा निर्धारित कड़े दिशा-निर्देशों के बिल्कुल विपरीत है। नियमों के मुताबिक, फ्लाई ऐश का निस्तारण केवल उन्हीं वैज्ञानिक तरीकों से और उन्हीं सूखे स्थानों पर किया जा सकता है जहां जलभराव की स्थिति न हो, ताकि भूजल और स्थानीय जलस्रोतों पर इसका कोई विपरीत असर न पड़े। मानकों में स्पष्ट तौर पर दर्ज है कि हर एक मीटर राखड़ की डंपिंग के बाद उसके ऊपर मिट्टी की मोटी परत बिछाना अनिवार्य है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। पानी के ऊपर ही सीधे गाड़ियां खाली की जा रही हैं, जिससे पूरी राखड़ पानी में घुलकर नीचे बैठ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लाई ऐश में कई तरह की भारी धातुएं और विषैले रासायनिक तत्व होते हैं। यदि बिना वैज्ञानिक उपचार के इसे पानी में डाला जाता रहा, तो आने वाले समय में क्षेत्र का पूरा भूजल स्रोत प्रदूषित हो जाएगा, जिसका सीधा और घातक असर कृषि, मवेशियों और इंसानी स्वास्थ्य पर पड़ना तय है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न प्रशासनिक तंत्र की मूक सहमति पर उठता है। सवाल यह है कि जिन खदानों में स्थायी रूप से पानी भरा हुआ है, वहां फ्लाई ऐश भराव की अनुमति आखिर किस आधार पर दे दी गई? क्या परमिशन जारी करने से पहले किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके का मुआयना करने की जहमत उठाई थी? स्थानीय नागरिकों का स्पष्ट आरोप है कि बिना किसी वैज्ञानिक मूल्यांकन, भूजल स्तर की जांच या जलग्रहण क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को देखे, बंद कमरों में बैठकर केवल दस्तावेजी औपचारिकताएं पूरी कर दी गईं। खनिज विभाग और डीजीएमएस की सुस्त निगरानी व्यवस्था के कारण खदानों की वास्तविक गहराई, सुरक्षा घेरे और चेतावनी बोर्ड जैसे बुनियादी नियमों को भी गायब कर दिया गया है।
अकलतरा क्षेत्र के स्थानीय सूत्रों की मानें तो इस इलाके में करीब 35 से अधिक छोटी-बड़ी चूना पत्थर खदानें हैं, जिनमें से लगभग 20 खदानों में चौबीसों घंटे डंपिंग का खेल चल रहा है। रोजाना करीब 1000 टन से अधिक औद्योगिक राखड़ विभिन्न संयंत्रों से लाकर यहां खपाई जा रही है। इस खेल के पीछे एक बड़ा आर्थिक नेटवर्क काम कर रहा है, जहां खदान संचालकों को प्रति टन के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जिससे हर दिन लाखों रुपये का अवैध कारोबार हो रहा है। इतना ही नहीं, कुछ रसूखदार खदान संचालक पुराने अवैध और असुरक्षित खनन के गड्ढों को छिपाने के लिए भी इस राखड़ का इस्तेमाल ढाल के रूप में कर रहे हैं। खतरे की भयावहता को देखते हुए अब स्थानीय ग्रामीणों ने राज्य सरकार से उच्चस्तरीय और स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच की मांग की है, ताकि समय रहते इस क्षेत्र को एक बड़े पर्यावरणीय संकट से बचाया जा सके।
इस संवेदनशील मुद्दे पर जब बिलासपुर क्षेत्रीय पर्यावरण मंडल कार्यालय की क्षेत्रीय अधिकारी रश्मि श्रीवास्तव से बात की गई, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में माना कि पानी से भरी खदानों में राखड़ का भराव करना पूरी तरह से गैर-कानूनी और पर्यावरणीय नियमों के खिलाफ है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि तरौद और किरारी क्षेत्रों में चल रही इन गतिविधियों की तत्काल जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। बहरहाल, अब देखना यह होगा कि पर्यावरण की रक्षा के लिए बने नियम सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे या फिर प्रशासनिक अमला जमीन पर उतरकर इस विनाशकारी डंपिंग को रोकने का साहस दिखाएगा। फिलहाल, अकलतरा के त्रस्त ग्रामीणों की नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।
