बीजापुर। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में ग्रामीणों द्वारा अपनी मेहनत की मजदूरी का भुगतान मांगने पर लोक निर्माण विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी द्वारा अजीबोगरीब कदम उठाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिले के बिरयाभूमि से इडेर तक बन रही सड़क के मामले में प्रभारी कार्यपालन अभियंता (ईई) नवीन तोंडे की कार्यशैली पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दरअसल, जब ग्रामीणों ने अपनी बकाया मजदूरी की गुहार लगाते हुए जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा, तो उसके ठीक बाद अधिकारी ने आनन-फानन में रविवार 17 मई को जनसंपर्क विभाग (पीआरओ) के माध्यम से एक आदेश जारी कर दिया। हैरान करने वाली बात यह है कि इस आदेश में ‘बैक डेट’ यानी 14 मई की तारीख डालकर सड़क निर्माण कार्य को ही निरस्त घोषित कर दिया गया। अधिकारी के इस रवैये से क्षेत्र के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और उन्होंने विभाग पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं।
पूरा मामला तब तूल पकड़ा जब बिरयाभूमि से इडेर सड़क निर्माण में काम कर रहे ग्रामीणों ने 15 मई को कलेक्टर से मिलकर भुगतान कराने की मांग की थी। इसके साथ ही ग्रामीणों ने ईई नवीन तोंडे से भी व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर अपनी आर्थिक दिक्कतों का हवाला देते हुए राहत देने की अपील की थी। लेकिन ग्रामीणों की समस्या का संवेदनशीलता से समाधान निकालने के बजाय, मामले को दबाने की नीयत से पिछले दरवाजे से सड़क निरस्तीकरण का खेल खेल दिया गया। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारी अपनी व्यक्तिगत रोटियां सेंकने के लिए गरीब मजदूरों का हक मारना चाहते हैं। सड़क को निरस्त करने के पीछे की असली मंशा अपने चहेते ठेकेदारों को उपकृत करना और नया काम दिलाना है।
ग्रामीणों के इन आरोपों को इसलिए भी बल मिल रहा है क्योंकि यह सड़क परियोजना कोई नई नहीं है। इस मार्ग पर लगभग 9 किलोमीटर का निर्माण कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और पूर्व में मजदूरों को दो बार भुगतान भी किया जा चुका है। जब कार्य प्रगति पर था, तब अचानक बैक डेट में जाकर पूरी प्रक्रिया को ही रद्द कर देना विभाग की मंशा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। एक तरफ राज्य सरकार ‘सुशासन तिहार’ और ‘बस्तर मुन्ने’ जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों के जरिए बस्तर के सुदूर अंचलों तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की हरसंभव कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर बैठे कुछ अधिकारी ग्रामीणों की जायज मांग को कुचलने में लगे हैं। मजदूरी न देनी पड़े, इसके लिए सीधे सड़क को ही कागजों में निरस्त कर देना अधिकारियों और चहेते ठेकेदारों की आपसी साठगांठ को उजागर करता है।
इस पूरे विवाद में अधिकारियों की असंवेदनशीलता का अंदाजा ग्रामीण मजदूर रवींद्र फरसा के बयान से लगाया जा सकता है। रवींद्र ने बताया कि जब उन्होंने भुगतान के सिलसिले में ईई नवीन तोंडे से बात की, तो अधिकारी का दोटूक जवाब था कि ‘मैं तुम्हें नहीं जानता, तुम कौन से थर्ड पार्टी हो? मैं सिर्फ ठेकेदार को जानता हूँ।’ वहीं दूसरी तरफ, उच्च अधिकारियों के सामने ईई ने यह दलील दी कि ठेकेदार द्वारा बिल बनाकर कार्यालय में जमा करने पर तुरंत भुगतान कर दिया जाएगा। अधिकारी के इन विरोधाभासी बयानों और उसके तुरंत बाद हड़बड़ाहट में जारी किए गए बैक डेट के आदेश से यह साफ है कि मजदूरों की मजदूरी डकारने की नीयत से यह पूरी स्क्रिप्ट लिखी गई है।
अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठता है कि यदि पीएमजीएसवाई (PMGSY) विभाग के अंतर्गत चल रहा यह कार्य पिछले 6 सालों से बंद पड़ा था, तब विभाग ने इसका टेंडर निरस्त क्यों नहीं किया? जब तक ग्रामीण खामोश थे, तब तक फाइलें दबी रहीं। लेकिन जैसे ही 15 मई को ग्रामीणों ने कलेक्टर के पास जाकर अपनी आवाज बुलंद की और ठेकेदार व विभाग की लेटथमीफी को उजागर किया, वैसे ही 17 मई को पीआरओ के जरिए 14 मई की तारीख वाला निरस्तीकरण पत्र सामने आ गया। इस पूरे घटनाक्रम ने जिले के प्रशासनिक अमले की पारदर्शिता और नियत को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है।
