मऊगंज। कहते हैं कि यदि रगों में जीतने का लहू और मन में अटूट विश्वास हो, तो शरीर की कोई भी लाचारी आपके सपनों का रास्ता नहीं रोक सकती। एक ऐसा ही प्रेरणादायी इतिहास रच दिखाया है एक जांबाज दिव्यांग बेटे ने, जिसने अपनी शारीरिक अक्षमताओं को अपने फौलादी हौसलों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। पैर से ठीक ढंग से न चल पाने की बड़ी चुनौती के बावजूद, इस होनहार युवा ने विपरीत परिस्थितियों के क्रूर थपेड़ों के सामने कभी हार नहीं मानी। लगातार संघर्ष की भट्टी में तपने के बाद, उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में न सिर्फ शानदार सफलता हासिल की है, बल्कि राजस्व अधिकारी (Revenue Officer) जैसा बड़ा प्रशासनिक पद हासिल कर यह साबित कर दिया कि मंजिलों से ऊंची इंसानी जिद होती है। उनकी यह बेमिसाल कामयाबी आज देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए एक महा-प्रेरणा बन गई है, जो छोटी-छोटी रुकावटों के आगे अपने घुटने टेक देते हैं।
इस असाधारण मुकाम तक पहुँचने वाले पुष्पेंद्र कुमार चतुर्वेदी की यह गौरवगाथा रातों-रात मिली किसी किस्मत की लकीर नहीं है, बल्कि इसके पीछे बरसों की तपस्या और कभी न डिगने वाला संकल्प छुपा है। मऊगंज के मगनिया गांव के रहने वाले पुष्पेंद्र के पिता वन विभाग में नौकरी करते हैं, जिन्होंने सीमित साधनों के बावजूद अपने बेटे के हौसलों को हमेशा हवा दी। पुष्पेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई रीवा से पूरी की, जहाँ उन्होंने मुश्किलों के बीच भी पढ़ाई से नाता जोड़े रखा। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का रुख किया, जहाँ से उन्होंने अपना पोस्ट ग्रेजुएशन (स्नातकोत्तर) पूरा किया। इसी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के दौरान पुष्पेंद्र ने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की सिविल सर्विसेज परीक्षा की बेहद कठिन और गंभीर तैयारी शुरू की थी। अपनी इसी अटूट मेहनत के दम पर उन्होंने BPSC की 70वीं परीक्षा को पास कर यह बड़ी सफलता हासिल की। पुष्पेंद्र की सफलता ने आज यह अकाट्य सच साबित कर दिया है कि यदि आपका लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत पूरी ईमानदारी से की जाए, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आपकी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। आज उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि से पूरे क्षेत्र में खुशी का माहौल है और परिवार, मित्र व शुभचिंतक उन्हें बधाइयां दे रहे हैं।
अपनी इस अविश्वसनीय और ऐतिहासिक जीत पर बात करते हुए पुष्पेंद्र का स्वाभिमान और जज्बा साफ झलकता है। वे बताते हैं कि दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने कभी भी, एक पल के लिए भी खुद के मन में यह अहसास नहीं होने दिया कि वे दूसरों से अलग, कमजोर या लाचार हैं। वे आज भी हर उस काम को उतनी ही सहजता, पसंद और ताकत से करना पसंद करते हैं, जो एक आम और सामान्य दिखने वाला व्यक्ति करता है। अपनी इस महान सफलता का पूरा श्रेय पुष्पेंद्र ने अपने पूजनीय माता-पिता के आशीर्वाद, परिवार के अटूट संबल और अपने गुरुजनों के दिव्य मार्गदर्शन को दिया है। वास्तव में, पुष्पेंद्र की यह कहानी यह संदेश देती है कि दिव्यांगता केवल शरीर का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन अगर मन में उड़ान भरने का हौसला हो, तो पूरी कायनात आपके कदमों में होती है।
