नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने मध्य प्रदेश के चर्चित ट्विशा शर्मा मामले में कथित संस्थागत भेदभाव और न्याय प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ सोमवार को इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करेगी। इस उच्च स्तरीय पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में शनिवार, 23 मई की शाम 6:23 बजे इस मामले को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया। यह हस्तक्षेप ऐसे समय में हुआ है जब मृतका ट्विशा की ससुराल में हुई अप्राकृतिक मौत के बाद से ही जांच की निष्पक्षता और रसूखदारों के प्रभाव को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि सोमवार को ही इस मामले की गूंज मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी सुनाई देगी, लेकिन वहां सुनवाई का दायरा अलग होगा। हाई कोर्ट में राज्य सरकार की उस याचिका पर सुनवाई होनी है, जिसमें मृतका की सास और पूर्व जिला जज राजबाला सिंह की अग्रिम जमानत का विरोध किया गया है। वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट व्यापक संदर्भों में इस बात की जांच करेगा कि क्या इस हाई-प्रोफाइल मामले में वाकई किसी स्तर पर संस्थागत पक्षपात हुआ है और क्या रसूख के दम पर कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई है।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। रजिस्ट्री ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष एक विस्तृत प्रशासनिक नोट प्रस्तुत कर स्वतः संज्ञान लेने की विशेष अनुमति मांगी थी। इस आधिकारिक नोट में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था कि विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और घटनाक्रमों से यह साफ संदेश जा रहा है कि जांच की शुचिता खतरे में है। चूंकि मृतका की सास एक सेवानिवृत्त जिला जज हैं, इसलिए समाज के एक बड़े हिस्से में यह धारणा गहरे से पैठ बना चुकी है कि जांच को प्रभावित किया जा रहा है। नोट में ट्विशा को दी गई मानसिक प्रताड़ना, दहेज की मांग और पूरे मामले को रसूख के बल पर दबाने के संगीन आरोपों का हवाला देते हुए पूछा गया था कि क्या न्याय प्रणाली पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए? रजिस्ट्री ने सुझाव दिया था कि इस मामले को “इन री: शादीशुदा महिला की असामान्य मौत में संस्थागत पक्षपात और जांच में गड़बड़ी” के शीर्षक से दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य के लिए भी संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच के कड़े दिशानिर्देश तय किए जा सकें।
अदालती गलियारों में यह मामला तब और गरमा गया जब मृतका के फरार पति समर्थ सिंह के सरेंडर को लेकर जबलपुर हाई कोर्ट परिसर में भारी अराजकता देखी गई। लुकआउट नोटिस और 30 हजार रुपये का इनाम घोषित होने के बावजूद समर्थ शुक्रवार, 22 मई को वकीलों के एक बड़े समूह के संरक्षण में कोर्ट पहुंचा था। ट्विशा के परिजनों और उनके जीजा ने आरोप लगाया कि पूरा प्रशासनिक अमला और स्थानीय पुलिस समर्थ के सामने नतमस्तक नजर आई। सुबह से शहर में मौजूद होने के बाद भी न तो पुलिस और न ही विशेष जांच दल (SIT) ने उसे गिरफ्तार करने की जहमत उठाई। कोर्ट परिसर में मीडियाकर्मियों को कवरेज करने से रोका गया, उनके कैमरे हटाए गए और मृतका के पक्ष के वकीलों के साथ खुलेआम धक्का-मुक्की की गई।
इस हैरान करने वाले घटनाक्रम की आंखों देखी बयां करते हुए अधिवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने बताया कि शुक्रवार शाम जब वे जबलपुर में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के कोर्ट नंबर 32 में दाखिल हुए, तो वहां मुख्य आरोपी समर्थ सिंह आराम से बैठा हुआ था। उन्होंने कहा, “जब मैंने उसके साथ मौजूद लोगों से उसकी पहचान पूछी, तो पहले उन्होंने अनभिज्ञता जताई और फिर उसे भगाने का प्रयास किया। हमारे विरोध करने पर कई वकीलों ने गुंडागर्दी का मुजाहिरा करते हुए मीडिया और हमारे साथ हाथापाई की। वे आरोपी को दूसरी इमारत के एक चैंबर में ले गए, जहां हमारे साथ अभद्र गाली-गलौज की गई और हमें धकेल कर बाहर निकाल दिया गया। उनका व्यवहार किसी पेशेवर वकील जैसा कतई नहीं था।”
अधिवक्ता श्रीवास्तव ने आगे बताया कि आरोपी ने अपना चेहरा कपड़े और धूप के चश्मे से पूरी तरह छिपा रखा था और उसकी हर कोशिश कानून की गिरफ्त से भागने की थी। अदालती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “आरोपी बंद बत्तियों वाले कोर्ट रूम में, जहां केवल एसी और पंखे चल रहे थे, कटघरे में खड़े होने के बजाय वकीलों की कुर्सी पर वीआईपी की तरह बैठा था। हमें बताया गया कि माननीय न्यायाधीश ने उसे कस्टडी में लेने या स्थानीय पुलिस को सौंपने के बजाय भोपाल जाकर सरेंडर करने को कहा और वे खुद घर चले गए। यदि यह सच है, तो यह कानूनी प्रक्रिया का मखौल है। इस अफरा-तफरी और सिस्टम की मिलीभगत के जो वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, वे बेहद विचलित करने वाली हैं और यही वजह है कि अब देश की सबसे बड़ी अदालत को इस मामले में न्याय की कमान अपने हाथ में लेनी पड़ी है।”
