अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर में राजनीति भले ही हाई-प्रोफाइल हो, लेकिन धरातल पर सब ‘टाय-टाय फूस’ साबित हो रहा है। नगर की बदहाल सड़कें आज शहर का सबसे बड़ा नासूर और जनता के लिए मानसिक प्रताड़ना का सबब बन चुकी हैं। विडंबना देखिए कि सूबे में ‘साय सरकार’ का सुशासन होने और केंद्र से लेकर निगम तक भाजपा का ‘ट्रिपल इंजन’ होने के बावजूद, यहां के हालात जस के तस हैं। कल तक जब नगर निगम में कांग्रेस का कब्जा था, तब भाजपाई सड़कों की दुर्दशा पर छाती पीटते थे। आज खुद भाजपा सत्ता में है, लेकिन शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाना तो दूर, जनता को गड्ढामुक्त सड़कों जैसी मूलभूत सुविधा तक नसीब नहीं हो पा रही है। साल 2025 में निगम की सत्ता बदलते ही कुछ सड़कों की मरम्मत का ढिंढोरा तो पीटा गया, लेकिन उसमें भी ‘थूक-पॉलिश’ और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। दावों की इस गुणवत्ताहीन रिपेयरिंग और नूराकुश्ती के बीच पिसना सिर्फ और सिर्फ आम जनता की नियति बन चुका है, क्योंकि यहां सड़कों पर सिर्फ सियासत चमकती है, डामर नहीं।
इस बदहाली के बीच अब अम्बिकापुर नगर निगम की महापौर मंजूषा भगत का एक ऐसा दर्द और आक्रोश छलक पड़ा है, जिसने सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। नेशनल हाईवे (NH) के अड़ियल रवैये से तंग आकर महापौर ने सीधे तौर पर अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि शहर की जनता ने उन्हें वोट दिया है और वे टैक्स चुकाते हैं, लिहाजा सुख-सुविधाएं पाना उनका संवैधानिक अधिकार है। महापौर ने एनएच के अधिकारियों के अहंकार की पोल खोलते हुए सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि क्षेत्र के सांसद चिंतामणि महाराज और कैबिनेट मंत्री तक ने इस सड़क के लिए संबंधित अधिशासी अभियंता (EE) को 10-10 बार फोन घुमाया, लेकिन उस ‘ढीठ’ अफसर के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। बेबसी और गुस्से के इसी मिश्रण के साथ सत्ताधारी दल की महापौर ने चेतावनी दी है कि यदि 15 दिनों से महीने भर के भीतर पैच रिपेयरिंग का काम शुरू नहीं हुआ, तो वे एक महिला के रूप में अपना रौब दिखाएंगी और उग्र रूप धारण करने को मजबूर होंगी।
महापौर के इस तीखे बयान ने सीधे तौर पर साय सरकार के उस इकबाल पर कड़ा वार किया है, जहां ‘अफसरशाही’ पूरी तरह बेलगाम नजर आ रही है। यह बेहद गंभीर और चिंताजनक पहलू है कि जिस तंत्र में सांसद और रसूखदार मंत्रियों के फोन को ब्यूरोक्रेसी कचरे के डिब्बे में डाल देती हो, वहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की शक्ति और गरिमा का क्या वजूद रह जाता है? जब ‘डबल-ट्रिपल इंजन’ की धमक भी एक अदने से अफसर के सामने दम तोड़ दे, तो प्रशासनिक अनुशासन की धज्जियां उड़ना तय है। अब बड़ा सवाल यह है कि देर से ही सही, महापौर मंजूषा भगत ने जो तेवर दिखाए हैं, क्या बेलगाम अधिकारी उसका सम्मान करेंगे? या फिर सांसद और मंत्रियों की तरह महापौर की इस चेतावनी को भी साइडलाइन कर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? बहरहाल, अल्टीमेटम की घड़ी शुरू हो चुकी है; अब जनता को कोरे बयानों की सियासत नहीं, बल्कि धरातल पर काम चाहिए।
